संपादकीय
पद्मश्री और लोक संस्कृति का सम्मान: गुरु संग्युसांग पोंगेनर से सीख
भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह विविधता केवल बड़े शहरों, संग्रहालयों या शास्त्रीय कलाओं में ही नहीं, बल्कि दूर-दराज़ के गांवों, जनजातीय समुदायों और लोक कलाकारों की स्मृतियों में भी जीवित है। नागालैंड के आओ-नागा लोक कलाकार गुरु संग्युसांग पोंगेनर को पद्मश्री सम्मान मिलना इसी सांस्कृतिक भारत की पहचान को मजबूत करने वाला कदम है।
छह दशकों से अधिक समय तक आओ-नागा लोक गीतों, नृत्यों और परंपराओं को संरक्षित करने वाले पोंगेनर ने यह साबित किया है कि संस्कृति केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति होती है। जब कोई लोक कला समाप्त होती है, तब केवल एक कला शैली नहीं, बल्कि इतिहास, भाषा, परंपरा और समुदाय की पहचान का एक हिस्सा भी खो जाता है।
आज तकनीक और वैश्वीकरण के दौर में युवा पीढ़ी तेजी से आधुनिक जीवनशैली की ओर बढ़ रही है। यह परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन इसके साथ-साथ पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण की चुनौती भी सामने है। ऐसे समय में गुरु पोंगेनर जैसे लोक कलाकारों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने केवल स्वयं कला का अभ्यास नहीं किया, बल्कि 2,000 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण देकर सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य भी किया।
यह सम्मान एक व्यापक प्रश्न भी उठाता है—क्या हम अपने लोक कलाकारों और लोक संस्कृतियों को पर्याप्त महत्व दे रहे हैं? देश में अनेक लोक कलाकार ऐसे हैं जो आर्थिक कठिनाइयों और सरकारी उपेक्षा के बावजूद अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तब मिलती है जब उनकी उम्र का बड़ा हिस्सा संघर्ष में बीत चुका होता है।
पद्मश्री सम्मान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संदेश देता है कि राष्ट्र केवल आर्थिक विकास से महान नहीं बनता, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संरक्षित रखकर भी समृद्ध होता है। पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिलना भारत की एकता में विविधता की भावना को भी सुदृढ़ करता है।
गुरु संग्युसांग पोंगेनर का सम्मान हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता और परंपरा विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। विकास की दौड़ में यदि हम अपनी लोक संस्कृति को पीछे छोड़ देंगे, तो हमारी पहचान अधूरी रह जाएगी। इसलिए आवश्यकता केवल पुरस्कार देने की नहीं, बल्कि लोक कलाकारों, जनजातीय भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक नीति और संसाधन उपलब्ध कराने की भी है।
गुरु पोंगेनर का पद्मश्री सम्मान एक व्यक्ति की उपलब्धि से कहीं अधिक, भारत की सांस्कृतिक आत्मा को दिया गया सम्मान है।
