सरस्वती ताल और केदारताल के सर्वेक्षण से उत्तराखण्ड ने तेज किया GLOF से निपटने का अभियान
देहरादून। हिमालय की ऊंची चोटियों पर जमा बर्फ और ग्लेशियरों के बीच बन रही झीलें अब केवल प्राकृतिक सुंदरता का हिस्सा नहीं रह गई हैं।

बदलते हिमालयी पर्यावरण के बीच इन झीलों की निगरानी उत्तराखण्ड के लिए आपदा प्रबंधन की बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
इसी संभावित खतरे को देखते हुए राज्य सरकार ने सरस्वती ताल और केदारताल के वैज्ञानिक सर्वेक्षण का अभियान शुरू किया है। विशेषज्ञों की टीम मंगलवार को दोनों झीलों के अध्ययन के लिए रवाना हुई। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि इन झीलों की वर्तमान स्थिति क्या है, इनमें पानी का स्तर कितना है और भविष्य में इनके अस्थिर होने की स्थिति में नीचे बसे क्षेत्रों पर कितना खतरा पैदा हो सकता है।

उत्तराखण्ड में 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से चार का सर्वेक्षण पहले ही किया जा चुका है। अब शेष झीलों का चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है।
5,700 मीटर की ऊंचाई पर सरस्वती ताल
चमोली जिले में लगभग 5,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सरस्वती ताल का सर्वेक्षण आसान नहीं है। इसी तरह उत्तरकाशी की केदारताल लगभग 4,750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदलता है और भू-भाग बेहद दुर्गम है। ऐसे में यहां सामान्य सर्वेक्षण के बजाय विशेषज्ञों, पर्वतारोहियों, वैज्ञानिक संस्थानों और आपदा प्रबंधन बलों की संयुक्त विशेषज्ञता की जरूरत पड़ती है।
असली सवाल झील से ज्यादा नीचे बसे क्षेत्रों का
ग्लेशियर झीलों के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल झील का आकार या पानी का स्तर मापना नहीं है। असली सवाल यह है कि यदि किसी झील में अचानक पानी का दबाव बढ़ता है या झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो उसका पानी किस रास्ते से नीचे आएगा और रास्ते में क्या-क्या प्रभावित होगा?
इसीलिए इस सर्वेक्षण में डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों का भी अध्ययन किया जाएगा। संभावित बाढ़ के रास्ते, संवेदनशील भू-भाग, नदी घाटियां, पुल, सड़कें, बस्तियां और अन्य महत्वपूर्ण ढांचों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का आकलन आपदा तैयारी के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
GLOF: कुछ घंटों की चेतावनी जीवन बचा सकती है
ग्लेशियर झील के अचानक फटने या उसका प्राकृतिक बांध टूटने से आने वाली बाढ़ को Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है। ऐसी घटना में पानी और मलबे का विशाल प्रवाह कम समय में नदी घाटियों की ओर बढ़ सकता है।
यही कारण है कि सरकार अब केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव की तैयारी के बजाय पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर जोर दे रही है।
आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण, संचार प्रणाली और अन्य तकनीकी संसाधनों के माध्यम से झीलों की निगरानी करने की योजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
वैज्ञानिकों से लेकर NDRF और SDRF तक एक साथ
इस अभियान की खासियत यह है कि इसमें एक ही संस्था पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।
विशेषज्ञ दल में USDMA, ULMMC, बाबा साहनी पुराविज्ञान संस्थान लखनऊ, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, NIH रुड़की, SDRF, NDRF और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के विशेषज्ञ शामिल हैं।
यह बहु-संस्थागत मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लेशियर झील का खतरा केवल भूविज्ञान का विषय नहीं है। इसमें जल विज्ञान, ग्लेशियोलॉजी, पर्वतारोहण, रिमोट सेंसिंग, आपदा प्रबंधन, संचार और स्थानीय स्तर की तैयारी—सभी की भूमिका होती है।
सवाल अब निगरानी से आगे का है
उत्तराखण्ड में 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान एक महत्वपूर्ण शुरुआत है, लेकिन चुनौती इससे कहीं बड़ी है।
क्या इन झीलों की निगरानी सालभर होगी?
क्या इनके जलस्तर में बदलाव का रियल-टाइम डेटा उपलब्ध होगा?
क्या डाउनस्ट्रीम गांवों और शहरों तक आपात चेतावनी कुछ मिनटों में पहुंच सकेगी?
क्या संभावित GLOF मार्गों पर नियमित मॉक ड्रिल होगी?
और क्या स्थानीय समुदायों को इस खतरे के बारे में पर्याप्त जानकारी दी जाएगी?
इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण वास्तव में जमीनी आपदा सुरक्षा में कितना बदलता है।
उत्तराखण्ड पहले ही भूस्खलन, बादल फटने, बाढ़ और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जूझता रहा है। ऐसे में ग्लेशियर झीलों की निगरानी को केवल एक वैज्ञानिक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि हिमालयी आपदा सुरक्षा की दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखने की जरूरत है।
सरस्वती ताल और केदारताल से शुरू हुआ यह अभियान अब उत्तराखण्ड के लिए एक बड़ी परीक्षा भी है—क्या हम आपदा आने का इंतजार करेंगे या हिमालय के बदलते संकेतों को पहले पढ़कर तैयारी करेंगे?
