SAHYOG पोर्टल: साइबर सुरक्षा का औज़ार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नया दबाव?
डिजिटल युग में सूचना की गति जितनी तेज़ हुई है, उतनी ही तेजी से फर्जी खबरें, साइबर अपराध और ऑनलाइन दुष्प्रचार की चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने SAHYOG (Secure and Harmonised Online Governance) Portal की शुरुआत की है। सरकार का दावा है कि यह पोर्टल कानून प्रवर्तन एजेंसियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के बीच समन्वय बढ़ाकर अवैध सामग्री पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करेगा। लेकिन इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ है—क्या यह व्यवस्था साइबर सुरक्षा को मजबूत करेगी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नए दबाव का माध्यम बन सकती है?
SAHYOG पोर्टल का कानूनी आधार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(b) में निहित है, जिसके तहत सरकार द्वारा चिन्हित अवैध सामग्री को हटाने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों को निर्देश दिए जा सकते हैं। सिद्धांततः यह व्यवस्था समाज में घृणा फैलाने वाली सामग्री, साइबर ठगी, बाल यौन शोषण सामग्री और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े खतरों को रोकने के लिए उपयोगी प्रतीत होती है। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई न केवल आवश्यक बल्कि अनिवार्य भी है।
समस्या तब शुरू होती है जब “अवैध सामग्री” की परिभाषा व्यापक और अस्पष्ट हो जाती है। यदि किसी समाचार रिपोर्ट, खोजी पत्रकारिता, सरकारी नीतियों की आलोचना या जनहित से जुड़े खुलासों को भी शिकायतों के आधार पर हटाने की प्रक्रिया शुरू हो जाए, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, नीतियों की समीक्षा और सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का मूल दायित्व है। यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म किसी सरकारी नोटिस के दबाव में बिना पर्याप्त परीक्षण के सामग्री हटाने लगें, तो इसका प्रभाव केवल पत्रकारों पर नहीं बल्कि नागरिकों के सूचना के अधिकार पर भी पड़ेगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि डिजिटल समाचार माध्यम आज सूचना प्रसार का प्रमुख स्रोत बन चुके हैं। ऐसे में किसी रिपोर्ट या वीडियो को हटाने का निर्णय केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित करने वाला कदम भी हो सकता है। इसलिए पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायिक निगरानी इस पूरी व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा होनी चाहिए।
सरकार का यह तर्क उचित है कि इंटरनेट को पूरी तरह अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि नियंत्रण की व्यवस्था संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुरूप हो। यदि कंटेंट हटाने के आदेशों का स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक न हो, प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर न मिले और अपील की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो ऐसी प्रणाली पर अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र की शक्ति केवल कानून लागू करने में नहीं, बल्कि आलोचना को सहने और जवाबदेह बने रहने में भी निहित होती है। SAHYOG पोर्टल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह साइबर अपराधों के विरुद्ध प्रभावी हथियार बने, न कि असहमति और स्वतंत्र पत्रकारिता पर अंकुश लगाने का माध्यम।
अंततः प्रश्न पोर्टल का नहीं, उसके उपयोग का है। यदि पारदर्शिता, न्यायिक समीक्षा और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है, तो SAHYOG डिजिटल शासन का प्रभावी उपकरण बन सकता है। लेकिन यदि इसका प्रयोग असहमति को दबाने के लिए हुआ, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस स्वतंत्रता के लिए एक नई चुनौती साबित होगा। लोकतंत्र में सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों आवश्यक हैं; किसी एक की कीमत पर दूसरे का संरक्षण टिकाऊ नहीं हो सकता।
