हिमालय पर डबल प्रदूषण की मार: मैदानी राज्यों का धुआं और पहाड़ों में बढ़ती वाहन भीड़
देहरादून/नई दिल्ली। हिमालयी ग्लेशियरों और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर प्रदूषण का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब और हरियाणा जैसे मैदानी राज्यों से उठने वाला प्रदूषण अब हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। शोध के अनुसार 2010-2019 के दौरान इंडो-गंगेटिक प्लेन (आईजीपी) में कणीय प्रदूषण 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ा और इसका असर हिमालयी क्षेत्र तक दर्ज किया गया।
शोधकर्ताओं ने नासा के उपग्रह आंकड़ों सहित 25 वर्षों के डेटा का विश्लेषण करते हुए पाया कि बिहार और दक्षिणी पश्चिम बंगाल सबसे बड़े प्रदूषण हॉटस्पॉट बनकर उभरे हैं। अध्ययन के अनुसार फसल अवशेष जलाने, बायोमास ईंधन और अन्य स्रोतों से उत्पन्न प्रदूषक कण वायुमंडलीय प्रवाह के साथ हिमालय तक पहुंच रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय केवल बाहरी प्रदूषण की ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर बढ़ते दबाव की भी मार झेल रहा है। उत्तराखंड समेत कई पर्वतीय शहरों में बढ़ती वाहन संख्या, घंटों लगने वाले ट्रैफिक जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और सड़कों पर अतिक्रमण वायु प्रदूषण को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण बन रहे हैं।
पर्यावरणविदों का कहना है कि संकरी सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें ईंधन की खपत और धुएं के उत्सर्जन को बढ़ाती हैं। वहीं अनियोजित शहरीकरण और अतिक्रमण यातायात प्रबंधन को और जटिल बना देते हैं। इसका सीधा असर स्थानीय वायु गुणवत्ता पर पड़ता है।
वैज्ञानिक शोध पहले भी संकेत दे चुके हैं कि वायु प्रदूषण से उत्पन्न कालिख (ब्लैक कार्बन) और सूक्ष्म कण हिमालयी बर्फ पर जमकर उसकी परावर्तन क्षमता कम कर देते हैं, जिससे ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय को बचाने के लिए केवल शहरों में प्रदूषण नियंत्रण पर्याप्त नहीं होगा। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को ग्रामीण क्षेत्रों, बायोमास जलाने वाले क्षेत्रों तथा हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों तक विस्तारित करने की आवश्यकता है। साथ ही पर्वतीय नगरों में यातायात प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन, पार्किंग नीति और अतिक्रमण नियंत्रण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।
हिमालय आज दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है—एक ओर मैदानी क्षेत्रों से पहुंच रहा प्रदूषण और दूसरी ओर पहाड़ों में बढ़ता स्थानीय पर्यावरणीय दबाव। यदि समय रहते समग्र नीति नहीं बनाई गई तो इसका असर ग्लेशियरों, जल स्रोतों और करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा पर पड़ सकता है।
