किसानों को संपन्न बनाने के लिए कृषि क्षेत्र में कानूनी सुधार सबसे बड़ी चुनौती
नई दिल्ली, सुरेंद्र प्रसाद सिंह। नीति आयोग की बैठक में कृषि क्षेत्र को लाभकारी बनाने के लिए उसमें ढांचागत सुधार पर जोर दिया गया। लेकिन इन सुधारों में राज्यों का साथ बहुत अहम है, जो केंद्र को अब तक नहीं मिल पाया है। खेती को नई ऊंचाइयों तक ले जाने और किसानों को संपन्न बनाने के लिए इसमें कानूनी सुधार सबसे बड़ी चुनौती है। बुनियादी सुविधाओं में निवेश, सिंचाई सुविधा मुहैया कराने, उपज के रखरखाव, प्रोसेसिंग और लाभकारी मूल्य दिलाने की राह बहुत आसान नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर नीति आयोग के वाइस चेयरमैन तक ने कृषि की चुनौतियों से पार पाने के उपाय सुझाए हैं। राज्यों को साथ लेने के उद्देश्य से ही कृषि सुधार के लिए कारगर पहल करते हुए मुख्यमंत्रियों की एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित करने का फैसला किया है। इससे राज्यों के साथ मिलकर कृषि क्षेत्र में कानूनी सुधार करने में मदद मिल सकती है। नीति आयोग की बैठक में जिन प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई, उनमें कृषि में निवेश को बढ़ाने पर जोर दिया गया।
कृषि क्षेत्र में निवेशकों का आना जरूरी
कृषि में ढांचागत विकास के लिए निवेश की महती जरूरत है, जिसमें सरकार के साथ निवेशकों का आना आवश्यक माना गया है। कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कानूनी सुधार में भूमि पट्टेदारी कानून, ठेके पर खेती, मार्केट सुधार, आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन अथवा समाप्त करने और जिंसों की आवाजाही की पूरी तरह छूट शामिल हैं।
उत्पादन के मुकाबले कम खपत से भी दिक्कत
कमोडिटी बाजार के विशेषज्ञ संजीव गर्ग के मुताबिक देश में कृषि फसलों के साथ अन्य उपज के उत्पादन के मुकाबले घरेलू खपत कम है। इसका विपरीत असर जिंस बाजार पर पड़ता है और कीमतें कई बार लागत से भी कम हो जाती हैं। दूसरी ओर, प्रतिस्पर्धी मूल्य नहीं होने से वैश्विक बाजार में जिंस टिक नहीं पाती हैं। गर्ग के मुताबिक खाद्यान्न प्रबंधन पर सरकार को विशेष जोर देना होगा। कृषि उपज के मूल्यवर्धन के लिए प्रोसेसिंग उद्योग को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
हर खेत को पानी पहुंचाने की नीति पर अमल शुरू कर दिया गया है, लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। कृषि क्षेत्र में कानूनी सुधार होने के साथ ही निवेशकों का रुझान इस ओर हो सकता है। देश में भूमिहीन किसानों का एक बड़ा तबका है, जिसे कानूनी सुधार न होने की वजह से सुविधाएं नहीं मिल पाती है। ठेके पर खेती को लेकर पिछले दो दशकों से राज्यों को अपने कानून में संशोधन करने के लिए केंद्र उन्हें मॉडल कानून भेजता रहा है। लेकिन कुछ राज्यों को छोड़कर ज्यादातर राज्यों ने उस पर अमल नहीं किया है।
जिंसों की बेरोकटोक आवाजाही बेहद जरूरी
किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाने और उनके नजदीक मंडी की सुविधा मुहैया कराने के फौरी प्रयास तो किए गए, लेकिन कुछ कानूनी अड़चनें अभी भी कायम हैं। एक राज्य से दूसरे राज्य में जिंसों की बेरोकटोक आवाजाही नहीं हो पाना बड़ी बाधा है। आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानूनों का औचित्य समाप्त हो गया है, फिर भी कायम वे हैं। उन्हें तत्काल प्रभाव से खत्म करने की जरूरत है, जिस पर सरकार संसद के आगामी सत्र में विधेयक ला सकती है।
