शिक्षक से जननेता तक की संघर्षपूर्ण यात्रा—लैंसडाउन से विधानसभा, योजना आयोग तक का सफर और वीआईपी संस्कृति के दौर में सादगी, ईमानदारी व जनप्रतिबद्धता की जीवंत मिसाल
विनम्र श्रद्धांजलि — मार्च में स्मरण, नमन के साथ
कल उनकी पुण्यतिथि थी, और आज यह लेख उनके प्रति श्रद्धा और स्मरण के भाव से लिखा जा रहा है। पूर्व विधायक एवं के उपाध्यक्ष रहे स्वर्गीय भारत सिंह रावत जी का जीवन सादगी, संघर्ष और समर्पण की ऐसी मिसाल है, जिसकी प्रासंगिकता समय के साथ और गहरी होती जा रही है।
एक शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले रावत जी ने समाज और पहाड़ की समस्याओं को नज़दीक से समझा। व्यापक जनसेवा के उद्देश्य से उन्होंने शिक्षक पद से त्यागपत्र देकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा। ब्लॉक प्रमुख के रूप में उन्होंने जमीनी विकास की बुनियाद मजबूत की। इसके बाद वे लगातार लैंसडाउन से विधायक चुने गए—जनता का यह विश्वास उनकी निष्ठा और कार्यशैली का प्रमाण था। आगे चलकर राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने नीति निर्माण में भी अपनी स्पष्ट और व्यावहारिक सोच का योगदान दिया।
लेकिन इन सभी पदों के बावजूद उनकी सादगी कभी नहीं बदली। सामान्य पहनावा, सीमित साधन और अनुशासित दिनचर्या—वे पद पर रहते हुए भी आम व्यक्ति की तरह जीवन जीते रहे। मुझे आज भी वे क्षण याद हैं जब मैं उन्हें झंडा चौक से अपने स्कूटर पर उनके घर छोड़ आता था। न कोई तामझाम, न कोई सुरक्षा घेरे का दिखावा। यह दृश्य आज की राजनीति के संदर्भ में दुर्लभ प्रतीत होता है।
कभी-कभी वे अचानक ही हमारे घर पिताजी से मिलने आ जाते। साधारण चाय के साथ पहाड़ की राजनीति, समाज और भविष्य पर गंभीर, व्यावहारिक चिंतन होता। वे आदर्शवाद के साथ-साथ धरातलीय समाधान पर बल देते थे।
आज जब वीआईपी संस्कृति, भारी काफिलों, ब्रांडेड परिधानों और छवि प्रबंधन की होड़ ने राजनीति की छवि बदल दी है, तब रावत जी का जीवन एक उजले अध्याय की तरह सामने आता है। उन्होंने सिद्ध किया कि जननेता वही है जो जनता के बीच सहजता से रहे, उनकी पीड़ा को समझे और बिना प्रदर्शन के काम करे।
मार्च के इस स्मरण में, हम उन्हें केवल याद ही नहीं करते, बल्कि यह संकल्प भी लेते हैं कि राजनीति को पुनः मूल्यों, सादगी और जनप्रतिबद्धता से जोड़ा जाएगा।
स्वर्गीय भारत सिंह रावत जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
सादर नमन। 🙏
