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स्टार्टअप इंडिया योजनाएँ और ‘कोबरा इफेक्ट’: जब प्रोत्साहन ही समस्या बन जाए

नई दिल्ली — ब्रिटिश शासनकाल की प्रसिद्ध “कोबरा इफेक्ट” की कहानी आज फिर प्रासंगिक हो रही है, खासकर भारत की स्टार्टअप इंडिया योजनाओं के संदर्भ में। जिस तरह कभी इनाम के लालच में लोग कोबरा पालने लगे थे, उसी तरह आज कुछ नीतिगत प्रोत्साहन अनजाने में गलत व्यवहार को जन्म दे रहे हैं।

भारत सरकार की महत्वाकांक्षी पहल Startup India का उद्देश्य नवाचार को बढ़ावा देना, रोजगार सृजन करना और उद्यमिता को आसान बनाना है। इस पहल को Department for Promotion of Industry and Internal Trade (DPIIT) के माध्यम से लागू किया जा रहा है। इसमें टैक्स छूट, सीड फंडिंग, आसान अनुपालन और सरकारी मान्यता जैसे लाभ शामिल हैं।

जब प्रोत्साहन उद्देश्य से भटक जाए

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ मामलों में स्टार्टअप इंडिया की योजनाएँ “आधुनिक कोबरा इफेक्ट” का रूप लेती दिख रही हैं। उदाहरण के तौर पर—

  • केवल सरकारी लाभ लेने के लिए कागज़ी या शेल स्टार्टअप बनाना
  • वास्तविक नवाचार के बजाय सब्सिडी और ग्रांट के पीछे भागना
  • पात्रता पाने के लिए यूज़र या राजस्व के आँकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना
  • पहले फंडिंग, बाद में टिकाऊ बिज़नेस मॉडल की सोच

यानी समस्या हल करने के लिए बने स्टार्टअप की जगह, प्रोत्साहन पाने के लिए स्टार्टअप खड़े किए जा रहे हैं।

“ग्रोथ एट एनी कॉस्ट” का खतरा

कुछ योजनाओं में तेज़ विकास पर अत्यधिक ज़ोर ने भी जोखिम बढ़ाया है—

  • अनुपालन और गवर्नेंस की अनदेखी
  • यूनिट इकॉनॉमिक्स को नज़रअंदाज़ कर आक्रामक विस्तार
  • प्रभाव (Impact) के नाम पर केवल आंकड़ों की बाज़ीगरी

जब इनाम सिर्फ संख्या पर आधारित होता है, तो व्यवहार भी उसी दिशा में ढल जाता है।

नीति में सुधार की ज़रूरत

नीति विशेषज्ञों का मानना है कि अब स्टार्टअप इंडिया योजनाओं को परिणाम-आधारित से आगे बढ़कर व्यवहार-आधारित बनाया जाना चाहिए, जैसे—

  • लंबे समय तक टिके रहने वाले स्टार्टअप
  • वास्तविक रोजगार सृजन
  • नैतिक कॉरपोरेट गवर्नेंस और अनुपालन
  • समाज और अर्थव्यवस्था पर ठोस प्रभाव

सीख क्या है?

कोबरा इफेक्ट हमें सिखाता है कि अच्छी नीयत काफी नहीं होती। हर नीति अपने साथ एक व्यवहार भी पैदा करती है। यदि प्रोत्साहन गलत तरीके से डिज़ाइन किए गए, तो समाधान ही समस्या बन सकता है।

भारत जब दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में अपनी जगह मजबूत कर रहा है, तब ज़रूरी है कि योजनाएँ सिर्फ स्टार्टअप की संख्या नहीं, बल्कि सही स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा दें।

वरना खतरा यह है कि कागज़ों पर स्टार्टअप तो बढ़ेंगे, लेकिन देश को आगे ले जाने वाले असली उद्यम कम पड़ जाएंगे।


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By udaen

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