जागर: आस्था बचे, अंधविश्वास नहीं
उत्तराखण्ड में जागर केवल पूजा-पाठ की परंपरा नहीं है। यह लोकगीत, ढोल-दमाऊं, लोकगाथाओं, देवविश्वास और सामुदायिक स्मृति का ऐसा संगम है, जिसने पहाड़ के समाज को पीढ़ियों से अपनी जड़ों से जोड़े रखा है।
लेकिन आज सवाल यह है कि क्या हम जागर की सांस्कृतिक आत्मा को बचाते हुए उसके नाम पर पनपने वाले अंधविश्वास से भी दूरी बना सकते हैं?
इसका जवाब होना चाहिए—हाँ।
जागर में लोकदेवताओं और लोकनायकों की गाथाएं हैं। इनमें पहाड़ का इतिहास, सामाजिक स्मृति, स्थानीय न्याय-बोध और सामुदायिक अनुभव भी सुरक्षित हैं। इसलिए इसे केवल अंधविश्वास कहकर खारिज करना उतना ही गलत होगा, जितना जागर से जुड़ी हर लोकमान्यता को वैज्ञानिक सत्य मान लेना।
आधुनिक उत्तराखण्ड के सामने यही संतुलन सबसे बड़ी चुनौती है।
किसी व्यक्ति पर कथित देव-अवतरण को लेकर यदि सामाजिक दबाव बनाया जाए, बीमारी को चिकित्सा के बजाय केवल दैवी कारण से जोड़ा जाए या भय पैदा करके आर्थिक अथवा सामाजिक शोषण किया जाए, तो वहां सवाल उठाना जरूरी है। आस्था व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन अंधविश्वास के नाम पर किसी के अधिकारों का हनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि आधुनिकता के नाम पर हमारी लोकपरंपराओं को मिटा न दिया जाए। जागर के जगरिये, ढोल-दमाऊं के कलाकार और लोकगाथाओं के जानकार हमारे जीवित सांस्कृतिक अभिलेखागार हैं। इनके पास वह ज्ञान है जो कई बार सरकारी अभिलेखों में नहीं मिलता।
उत्तराखण्ड में सांस्कृतिक संरक्षण की नीति इसलिए केवल उत्सव और पर्यटन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लोकगाथाओं का दस्तावेजीकरण, जगरियों का सम्मान और आर्थिक संरक्षण, लोकभाषाओं में रिकॉर्डिंग तथा विश्वविद्यालयों और विद्यालयों में इनके अध्ययन की जरूरत है।
साथ ही समाज में वैज्ञानिक चेतना, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और संविधान प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी मजबूत करना होगा।
हमें तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ी को हम जागर की ढोल की थाप और लोकगाथा देंगे या उसके साथ जुड़ा भय और अंधविश्वास भी।
उत्तराखण्ड की संस्कृति को संग्रहालय में बंद करने की जरूरत नहीं है। उसे जीवित रखना है—लेकिन विवेक, संविधान और वैज्ञानिक चेतना के साथ।
जागर की आवाज दबनी नहीं चाहिए; उसे इतना स्पष्ट जरूर होना चाहिए कि उसमें संस्कृति की धुन सुनाई दे, अंधविश्वास का शोर नहीं।
