बैंक कर्मचारियों की मांगें जरूरी, लेकिन ग्राहक और जनता के पैसे की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण
28 से 30 सितंबर की प्रस्तावित बैंक हड़ताल स्थगित होने से करोड़ों ग्राहकों को राहत मिली है। IBA और UFBU के बीच बातचीत से टकराव फिलहाल टल गया है। लेकिन हड़ताल का स्थगन समस्या का समाधान नहीं है। अब बातचीत को पारदर्शी और समयबद्ध परिणाम तक पहुंचाना जरूरी है।
सभी शनिवार को बैंक अवकाश के मुद्दे पर संयुक्त समिति बनेगी। फैसला जो भी हो, उसमें कर्मचारियों के हित के साथ ग्रामीण ग्राहकों, वरिष्ठ नागरिकों, छोटे कारोबारियों और डिजिटल सुविधाओं से वंचित लोगों की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
लेकिन बैंकिंग व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल इससे भी आगे है—जनता के पैसे की जवाबदेही।
बड़े ऋणों के संकट, एनपीए, वसूली और राइट-ऑफ पर जनता को पर्याप्त पारदर्शिता क्यों न मिले? राइट-ऑफ को कर्जमाफी समझना गलत है, लेकिन यह जानना सार्वजनिक हित का विषय है कि राइट-ऑफ के बाद कितनी वसूली हुई और बड़े ऋणों में जोखिम का आकलन कैसे किया गया।
दूसरी ओर छोटा किसान, दुकानदार या स्वरोजगार करने वाला व्यक्ति किस्त चूकने पर तत्काल वसूली दबाव का सामना करता है। इसलिए सवाल किसी वर्ग को राहत देने का नहीं, बल्कि नियमों और जवाबदेही में पारदर्शिता और समानता का है।
अब सार्वजनिक मांगें स्पष्ट हों
- संयुक्त समिति की समयसीमा और प्रगति सार्वजनिक की जाए।
- शनिवार की छुट्टी पर निर्णय से पहले ग्राहक सेवा का प्रभाव आकलन सार्वजनिक हो।
- बड़े ऋणों, एनपीए, राइट-ऑफ और वसूली की समेकित जानकारी नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाए।
- राइट-ऑफ और कर्जमाफी का अंतर जनता को स्पष्ट बताया जाए।
- छोटे ऋणग्राहकों के लिए पारदर्शी और प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था हो।
- बैंकिंग शुल्क, ग्राहक शिकायत और साइबर धोखाधड़ी पर स्पष्ट जवाबदेही तय हो।
- सरकार, RBI, IBA और बैंक यूनियनों के बीच ऐसा नियमित संवाद हो जिससे विवाद हड़ताल से पहले ही सुलझाए जा सकें।
बैंक कर्मचारी भी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और ग्राहक भी। लेकिन दोनों के ऊपर एक तीसरी जिम्मेदारी है—जनता के पैसे और सार्वजनिक विश्वास की रक्षा।
हड़ताल टलना राहत है; अब पारदर्शिता और जवाबदेही ही असली परीक्षा है।
