✍️ संपादकीय | कोटद्वार की नदियाँ पूछ रही हैं: हमारा अपराध क्या है?
कोटद्वार—गढ़वाल का प्रवेश द्वार—आज विकास और लापरवाही के टकराव का प्रतीक बनता जा रहा है। जिस शहर को नदियों और नालों ने जीवन दिया, वही जलस्रोत आज सीवेज, प्लास्टिक और प्रशासनिक उदासीनता के बोझ तले कराह रहे हैं।
यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता और जवाबदेही के अभाव का परिणाम है।
नगर निगम कोटद्वार के अंतर्गत बहने वाले नाले और नदी खंड आज खुले सीवर बन चुके हैं। घरों का सीवेज, होटलों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का गंदा पानी बिना उपचार सीधे जलस्रोतों में छोड़ा जा रहा है। यह स्थिति न केवल जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का उल्लंघन है, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार पर भी सीधा प्रहार है।
कानून स्पष्ट है—
जलस्रोत को प्रदूषित करना अपराध है।
सज़ा का प्रावधान है।
जुर्माना करोड़ों तक जा सकता है।
यहाँ तक कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने देशभर में यह सिद्ध किया है कि “Polluter Pays Principle” सिर्फ़ काग़ज़ी सिद्धांत नहीं है।
फिर सवाल उठता है—
कोटद्वार में कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या नगर निगम को क़ानून की जानकारी नहीं?
या फिर जानकारी होते हुए भी इच्छाशक्ति का अभाव है?
हर बरसात में नाले उफनते हैं, बदबू फैलती है, बीमारियाँ बढ़ती हैं—और उसके बाद सब कुछ फिर सामान्य मान लिया जाता है। यही “सामान्यीकरण” सबसे बड़ा अपराध है। क्योंकि जब गंदगी को सामान्य मान लिया जाता है, तब व्यवस्था भी निष्क्रिय हो जाती है।
आज ज़रूरत है—
- सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को वास्तव में चालू करने की
- नाला टैपिंग और नियमित मॉनिटरिंग की
- और सबसे ज़रूरी—जवाबदेही तय करने की
कोटद्वार की नदियाँ सिर्फ़ पानी नहीं बहातीं, वे इस शहर का भविष्य बहाती हैं।
अगर आज उन्हें नाले में बदल दिया गया, तो कल यही प्रदूषण
- पीने के पानी में होगा
- अस्पतालों की भीड़ में होगा
- और अगली पीढ़ी के जीवन में होगा।
यह लड़ाई सिर्फ़ पर्यावरण की नहीं,
नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक नैतिकता की है।
अब निर्णय नगर निगम कोटद्वार को करना है—
क्या वह इतिहास में समाधान का हिस्सा बनना चाहता है,
या फिर खामोशी के अपराध में शामिल होना चाहता है?
नदियाँ इंतज़ार नहीं करतीं।
समय अब भी है—लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं।
