कोटद्वार की राजनीति: कांग्रेस बनाम बीजेपी या तीसरे विकल्प की तलाश
कोटद्वार की राजनीति को आज अगर एक वाक्य में समझा जाए, तो वह यह है—यहाँ मुकाबला सिर्फ कांग्रेस बनाम बीजेपी का नहीं, बल्कि भरोसे बनाम निराशा का है।
राजनीति में कोई तय टैलेंट-बेस नहीं होता, लेकिन कोटद्वार में टैलेंट होते हुए भी नेतृत्व का दायरा सीमित होता गया है। यही वह बिंदु है जहाँ सवाल उठता है: क्या कोटद्वार को अब तीसरे विकल्प की ज़रूरत है?
: विरासत है, ऊर्जा कमज़ोर
कोटद्वार में कांग्रेस का सामाजिक आधार ऐतिहासिक रहा है। कर्मचारी, शिक्षक, पुराने सामाजिक कार्यकर्ता—एक समय कांग्रेस की ताकत थे। लेकिन बीते वर्षों में पार्टी ज़मीनी संवाद, स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक सक्रियता में पिछड़ती दिखी है।
कांग्रेस यहाँ अक्सर यादों की राजनीति करती नज़र आती है—क्या था, क्या रहा—लेकिन यह नहीं बता पाती कि आने वाले पाँच सालों में कोटद्वार को कैसे बदलेगी। टैलेंट मौजूद है, पर उसे आगे लाने का तंत्र कमज़ोर है।
: संगठन मज़बूत, स्थानीय सवाल कमजोर
बीजेपी ने कोटद्वार में संगठन, अनुशासन और चुनावी मशीनरी के बल पर बढ़त बनाई है। राष्ट्रीय नेतृत्व, विचारधारा और संसाधन उसकी ताकत हैं।
लेकिन आलोचना यह है कि स्थानीय मुद्दे अक्सर राष्ट्रीय नारों में दब जाते हैं। कोटद्वार की राजनीति को दिल्ली या देहरादून के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति ने स्थानीय टैलेंट और स्वतंत्र आवाज़ों को सीमित किया है। सत्ता में रहते हुए भी यदि शहर के बुनियादी सवाल जस के तस रहें, तो भरोसा धीरे-धीरे खिसकता है।
तो क्या तीसरा विकल्प ज़रूरी है?
यह सवाल किसी नई पार्टी का नहीं, बल्कि नई राजनीति का है।
तीसरा विकल्प तब पैदा होता है जब:
- जनता खुद को कांग्रेस में सुनी नहीं पाती
- बीजेपी में सवाल पूछने की जगह नहीं देखती
कोटद्वार में तीसरे विकल्प की संभावना इसलिए बनती है क्योंकि यहाँ:
- सेवानिवृत्त सैनिक हैं
- पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग है
- सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं की कमी नहीं
लेकिन ये सब वोटर तो हैं, निर्णायक भागीदार नहीं।
तीसरा विकल्प तभी सार्थक होगा जब वह:
- व्यक्ति-केंद्रित नहीं, मुद्दा-केंद्रित हो
- जाति या गुट नहीं, शहर को इकाई माने
- चुनावी मौसम नहीं, निरंतर जनसंवाद करे
कोटद्वार की राजनीति आज एक चौराहे पर खड़ी है।
एक तरफ कांग्रेस है, जिसे खुद को फिर से खड़ा करना होगा।
दूसरी तरफ बीजेपी है, जिसे स्थानीय सवालों के प्रति जवाबदेह बनना होगा।
और इनके बीच खड़ा है कोटद्वार का नागरिक—जो पूछ रहा है:
क्या हमें फिर उसी द्वंद्व में फँसे रहना है, या अपनी राजनीति खुद गढ़नी है?
क्योंकि जब हर व्यक्ति में कोई न कोई टैलेंट है,
तो कोटद्वार की राजनीति की असली परीक्षा यही है—
क्या वह उस टैलेंट को सिर्फ वोट मानेगी, या नेतृत्व भी बनने देगी?
