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✍️ संपादकीय | SHANTI Bill : शांति के नाम पर परमाणु बदलाव

भारत की संसद में हाल ही में चर्चा में आया SHANTI Bill केवल एक नया कानून नहीं, बल्कि देश की परमाणु ऊर्जा नीति में ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। जिस क्षेत्र को अब तक पूरी तरह सरकार का संवेदनशील और रणनीतिक दायरा माना जाता था, उसमें निजी भागीदारी का रास्ता खोलना अपने-आप में बड़े सवाल और संभावनाएँ दोनों पैदा करता है।

सरकार का तर्क स्पष्ट है—देश की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतें, जलवायु परिवर्तन की चुनौती और 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य। इन सबके लिए परमाणु ऊर्जा को एक स्थायी और स्वच्छ विकल्प के रूप में तेज़ी से आगे बढ़ाना ज़रूरी है। इसी सोच के तहत SHANTI Bill को एक ऐसे सुधार के रूप में पेश किया गया है, जो निवेश को आकर्षित करेगा और प्रक्रियाओं को सरल बनाएगा।

लेकिन सवाल यह है कि क्या “ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस” की दौड़ में “ईज़ ऑफ़ लिविंग” से समझौता तो नहीं हो रहा?

⚖️ जवाबदेही बनाम निवेश

बिल का सबसे विवादास्पद पहलू है परमाणु दुर्घटना की ज़िम्मेदारी। पुराने कानून में सप्लायर की भी जवाबदेही तय थी, जिसे अब लगभग समाप्त कर दिया गया है। नई व्यवस्था में मुख्य ज़िम्मेदारी संयंत्र संचालक पर होगी और उसकी भी एक सीमा तय है। यह व्यवस्था विदेशी और घरेलू निवेशकों के लिए राहत ज़रूर है, लेकिन आम नागरिक के मन में यह आशंका छोड़ जाती है कि किसी बड़े हादसे की स्थिति में पीड़ितों को पूरा न्याय मिलेगा या नहीं

🛡️ सुरक्षा पर भरोसा, लेकिन निगरानी?

सरकार यह भरोसा दिला रही है कि सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा और Atomic Energy Regulatory Board को वैधानिक ताक़त देकर निगरानी और मज़बूत की गई है ()। फिर भी, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या नियामक संस्थाएँ निजी पूँजी के दबाव से पूरी तरह मुक्त रह पाएँगी?

🏛️ संसद और लोकतांत्रिक विमर्श

चिंता का एक पहलू यह भी है कि इतने गंभीर और दूरगामी प्रभाव वाले बिल पर विस्तृत संसदीय और सार्वजनिक बहस अपेक्षित थी। संसद () में विपक्ष ने जिस तरह की आपत्तियाँ उठाईं, वे केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी थीं।

🔚 निष्कर्ष

SHANTI Bill भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और भविष्य-उन्मुख बनाने का साहसिक प्रयास है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन परमाणु ऊर्जा कोई सामान्य उद्योग नहीं है—यह पीढ़ियों तक असर डालने वाला निर्णय है। ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि विकास की रफ्तार के साथ-साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

क्योंकि अगर कभी “शांति” के नाम पर लाया गया यह बिल जनता के लिए असुरक्षा का कारण बना, तो इतिहास इसे सुधार नहीं, बल्कि चूक के रूप में याद रखेगा।


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By udaen

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