संपादकीय | नक्शे की आज़ादी, भरोसे की जिम्मेदारी
उत्तराखंड सरकार का यह फैसला कि अब छोटे और कम जोखिम वाले भवनों के नक्शे विकास प्राधिकरण नहीं, बल्कि इंपैनल आर्किटेक्ट की मुहर से स्वीकृत माने जाएंगे—निस्संदेह साहसिक और समयानुकूल सुधार है। लंबे समय से आम नागरिक जिस लालफीताशाही, देरी और अनावश्यक औपचारिकताओं से जूझ रहे थे, यह निर्णय उन्हें उससे राहत देने वाला है।
सरकार ने इसे ‘’ के दायरे में रखा है, और यही इसकी आत्मा भी है—सरकार का बोझ कम करना, व्यवस्था को सरल बनाना और नागरिकों पर भरोसा जताना।
सहूलियत का लोकतंत्रीकरण
अब सिंगल रेजिडेंशियल हाउस और छोटे व्यावसायिक भवनों के लिए नक्शा पास कराना किसी सरकारी दफ्तर की दहलीज़ पर निर्भर नहीं रहेगा। नागरिक चाहें तो विकास प्राधिकरण जाएं या फिर थर्ड पार्टी यानी इंपैनल आर्किटेक्ट के माध्यम से सेल्फ-सर्टिफिकेशन कराएं। यह विकल्प आधारित व्यवस्था प्रशासनिक सोच में आए बदलाव को दर्शाती है।
भरोसे के साथ जवाबदेही भी जरूरी
हालांकि, इस सहूलियत के साथ एक बड़ा प्रश्न भी जुड़ा है—क्या व्यवस्था दुरुपयोग से बच पाएगी? आर्किटेक्ट द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र की निरंतर निगरानी, रैंडम ऑडिट और सख्त दंड प्रावधान अनिवार्य होंगे। अन्यथा, यह सुधार कहीं अवैध निर्माण को बढ़ावा देने का माध्यम न बन जाए।
उद्योगों के लिए सकारात्मक संकेत
इसी कैबिनेट में उत्तराखंड सामान्य औद्योगिक विकास नियंत्रण (संशोधन) विनियमावली, 2025 को मंजूरी देकर सरकार ने उद्योग जगत, खासकर को भी राहत दी है। ग्राउंड कवरेज बढ़ाना और कंप्लायंस बर्डन कम करना, निवेश के अनुकूल माहौल बनाने की दिशा में सार्थक कदम है।
संतुलन ही सफलता की कुंजी
नक्शा पास करने की प्रक्रिया को सरल बनाना स्वागतयोग्य है, लेकिन निर्माण की गुणवत्ता, पर्यावरणीय संतुलन और शहरी नियोजन से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस तभी सार्थक होगा जब वह ईज ऑफ लिविंग में भी तब्दील हो।
सरकार ने भरोसे का जो दांव खेला है, उसकी सफलता अब निगरानी तंत्र और पेशेवर नैतिकता पर निर्भर करेगी। यदि संतुलन साधा गया, तो यह फैसला उत्तराखंड में शहरी विकास की दिशा और दशा—दोनों बदल सकता है।
