पत्रकारिता पर हमला: लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा
आज दुनिया भर में पत्रकार और प्रेस से जुड़े अन्य सदस्य अभूतपूर्व स्तर के खतरों का सामना कर रहे हैं। सच लिखना, सवाल पूछना और सत्ता को आईना दिखाना अब केवल पेशा नहीं रहा, बल्कि जान जोखिम में डालने का साहस बन गया है।
पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि पत्रकारों की लगभग 85 प्रतिशत हत्याएँ आज भी अनसुलझी हैं। यह स्थिति केवल अपराधियों के हौसले नहीं बढ़ाती, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सच बोलने वालों के लिए न्याय की कोई गारंटी नहीं है।
UNESCO के अनुसार, पिछले एक वर्ष में कम से कम 91 पत्रकारों की हत्या हुई है। यह आँकड़ा 2018 के बाद अब तक की सबसे अधिक वार्षिक मृत्यु संख्या को दर्शाता है। यह संख्या अपने आप में एक वैश्विक चेतावनी है कि पत्रकारिता कितनी असुरक्षित होती जा रही है।
हिंसा के साथ-साथ एक और गंभीर खतरा तेज़ी से बढ़ रहा है— अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्षरण। भय, दबाव, मुकदमों और दमनकारी नीतियों के चलते पत्रकार बड़े पैमाने पर आत्म-सेंसरशिप को अपनाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। सरकारें और शक्तिशाली समूह मीडिया संस्थानों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सूचना स्रोतों पर नियंत्रण मजबूत कर रहे हैं, जिससे स्वतंत्र प्रेस की भूमिका सीमित होती जा रही है।
यह स्थिति केवल मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं है। यह सीधे-सीधे आम नागरिक के जानने, समझने और सवाल पूछने के अधिकार पर हमला है। जब पत्रकार डर में काम करेंगे, तब समाज को अधूरी, छनकर आई और नियंत्रित सूचनाएँ ही मिलेंगी।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, वह सूचित नागरिकों से चलता है। और सूचित नागरिक तभी संभव हैं, जब पत्रकार निर्भीक होकर काम कर सकें। इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।
आज आवश्यकता है कि सरकारें, न्यायिक संस्थाएँ और अंतरराष्ट्रीय संगठन मिलकर पत्रकारों के खिलाफ अपराधों पर शून्य सहनशीलता की नीति अपनाएँ। दोषियों को सज़ा मिले, सुरक्षा तंत्र मज़बूत हों और प्रेस की स्वतंत्रता को संवैधानिक और व्यवहारिक दोनों स्तरों पर सुनिश्चित किया जाए।
यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं, तो सच सुरक्षित नहीं है।
और जब सच सुरक्षित नहीं रहता, तो लोकतंत्र केवल कागज़ों में ज़िंदा रह जाता है।
