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संपादकीय | जब पत्रकार ही खबरों की हत्या करने लगें

लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींव स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता मानी जाती है। कहा जाता है कि पत्रकार समाज की आँख और कान होता है, जो सत्ता के अंधेरे को उजाले में लाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब यही पत्रकार सच को दफना दे, खबरों की हत्या कर दे, तो लोकतंत्र का क्या होगा?

आज “खबर न चलाने” की संस्कृति केवल चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध बनती जा रही है। दबाव, प्रलोभन, भय या सौदेबाज़ी के कारण जब जनहित से जुड़ी सूचनाएँ जनता तक नहीं पहुँचतीं, तब यह केवल पत्रकारिता का पतन नहीं, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार की हत्या है।

संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है। अनुच्छेद 19(1)(a) पत्रकार को बोलने का अधिकार देता है, पर अनुच्छेद 19(2) यह भी स्पष्ट करता है कि यह अधिकार जनहित के विरुद्ध नहीं हो सकता। जब कोई पत्रकार जानबूझकर सच छिपाता है, तो वह इस अधिकार का दुरुपयोग करता है।

दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि भारत में खबरों की हत्या को सीधे अपराध मानने वाला कोई स्पष्ट कानून नहीं है। हाँ, परिस्थितियों के अनुसार , या के तहत कार्रवाई संभव है, लेकिन यह सब अप्रत्यक्ष और सीमित है।

जैसी संस्थाएँ नैतिक निंदा तो कर सकती हैं, पर दंड देने की शक्ति उनके पास नहीं है। यही कारण है कि खबरों की हत्या करने वाले अक्सर बेखौफ रहते हैं

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। क्योंकि अगर खबरें बिकने लगें, दबने लगें या सौदों का हिस्सा बन जाएँ, तो जनता सच और झूठ में फर्क कैसे करेगी? सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?

अब समय आ गया है कि देश यह तय करे—
क्या खबर दबाना सिर्फ अनैतिक कृत्य है या जनहित के खिलाफ अपराध?

ज़रूरत है:

  • खबर दबाने और जानबूझकर सूचना छिपाने को दंडनीय अपराध घोषित करने की
  • एक स्वतंत्र मीडिया लोकपाल की
  • और पत्रकारिता में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने की

क्योंकि अगर पत्रकार ही सच का गला घोंटने लगे,
तो याद रखना चाहिए—
खबरों की हत्या के बाद, बारी लोकतंत्र की होती है।


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By udaen

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