संपादकीय
देसी पहाड़ी से पहाड़ी–मैदानी तक: उत्तराखंड आखिर किस दिशा में जा रहा है?
उत्तराखंड एक बार फिर अपने ही विकास मॉडल के सामने खड़ा है—एक ऐसा मॉडल जो पहाड़ की जरूरतों से ज्यादा मैदानी कल्पनाओं से बना लगता है। सवाल यह नहीं कि विकास चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि किस कीमत पर और किसके लिए?
देसी पहाड़ी जीवन की सहजता से लेकर पहाड़ी–मैदानी विस्तार के टकराव तक राज्य जिस रास्ते पर बढ़ रहा है, वह हमें चेतावनी देता है कि दिशा सही हुए बिना गति केवल विनाश की ओर ले जाती है।
सबसे बड़ा संकट है—जनसंख्या असंतुलन और पलायन। पहाड़ों से युवाओं का बेरोक पलायन सिर्फ रोजगार की समस्या नहीं, सुरक्षा से लेकर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तक, सब पर गहरी चोट है। गांव खाली हैं, खेत बंजर हैं, और राज्य की ‘पहाड़ियत’ धीरे-धीरे शहरों की भीड़ में गुम हो रही है। विकास का मॉडल ऐसा बना दिया गया है कि देहरादून–हल्द्वानी–हरिद्वार की मैदानी पट्टी ही पूरा उत्तराखंड प्रतीत होने लगी है।
दूसरी ओर, जल–जंगल–जमीन पर लगातार दबाव है। अनियंत्रित निर्माण, अवैज्ञानिक सड़क चौड़ीकरण, और नदियों के किनारे कंक्रीट की दीवारें—सब मिलकर उत्तराखंड को एक खुली प्रयोगशाला में बदल रहे हैं। पर्यावरणीय चेतावनियां अब वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहीं; वे आज पहाड़ों के टूटते घरों, दरकती सड़कों और सूखते जलस्रोतों में साफ दिखाई दे रही हैं।
पर्यटन, जिसे समृद्धि का द्वार माना गया, अब बोझ बनता जा रहा है। बिना योजना के बढ़ते वाहनों, होटल विस्तार और चारधाम को सालभर के पर्यटन स्थल में बदलने की जल्दबाजी ने पहाड़ की वह क्षमता ही भूल गई है जो कभी उसे जीवंत रखती थी। पहाड़ अपनी ही मेहमाननवाज़ी के बोझ तले झुक गए हैं।
कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था की बात करें तो पहाड़ के खजाने का मूल्य आज भी बाजार नहीं समझता। मंदर, राजमा, झंगोरा, काफल, बुरांश, रिंगाल, हर्बल पौधे—यह सब दुनिया में प्रीमियम उत्पाद हैं। लेकिन स्थानीय किसान को इनका मूल्य नहीं मिलता, क्योंकि नीति में अब तक ‘पहाड़ी कृषि’ को प्राथमिक अर्थव्यवस्था नहीं माना गया।
सबसे संवेदनशील मुद्दा है—जमीन का तेज़ी से बदलता स्वामित्व। बाहरी निवेश, रियल एस्टेट विस्तार और अवैध कॉलोनियां पहाड़ी जिलों की सामाजिक संरचना पर भारी पड़ रही हैं। अगर पहाड़ की जमीन पहाड़ी जनता के हाथ से निकल गई, तो राज्य का भविष्य भी उनके हाथ से निकल जाएगा।
और इसी सबके बीच, संस्कृति और भाषा का संकट गहराता जा रहा है। गढ़वाली–कुमाऊनी बोली, लोकपर्व, लोककला और पहाड़ी जीवन-पद्धति धीरे-धीरे उत्तराखंड की किताबों में तो बच सकती हैं, पर जीवन में नहीं—अगर अभी भी हम दिशा न बदलें।
इन सब समस्याओं का सबसे गहरा पहलू यही है कि हमने अब तक पहाड़ को पहाड़ की तरह नहीं, मैदान की तरह विकसित करने की कोशिश की। प्रशासनिक ढांचा, शहरी तर्क, विकास की गति—सब मैदानी मानकों पर टिका है। जबकि पहाड़ के लिए पहाड़ का मॉडल ही काम आता है—स्थानीय, छोटे पैमाने का, प्रकृति-अनुकूल और समुदाय-केंद्रित।
आज ज़रूरत है कि उत्तराखंड अपनी विरासत से मुंह मोड़कर नहीं, बल्कि पहाड़ की पहचान को नए मॉडल में बदलकर आगे बढ़े।
यह निर्णय राज्य की सरकार को ही नहीं, बल्कि समाज, युवाओं और नीति निर्माताओं को मिलकर लेना होगा।
प्रश्न सीधा है:
क्या उत्तराखंड अपनी पहाड़ियत बचाए रखते हुए समृद्धि की ओर बढ़ेगा,
या विकास के नाम पर अपनी आत्मा ही खो देगा?
जवाब हमारे आज के फैसलों में छिपा है—और समय ज्यादा नहीं बचा।
