₹1,200 प्रतिमाह विज्ञापन पर उठे सवाल, न्यूज़ पोर्टलों ने सरकार से मांगी व्यावहारिक विज्ञापन नीति
देहरादून। उत्तराखंड में डिजिटल मीडिया और न्यूज़ पोर्टलों को सरकारी विज्ञापन व्यवस्था में उचित स्थान और व्यवहारिक दरें दिए जाने का मुद्दा एक बार फिर जोर पकड़ रहा है। पत्रकार संगठनों और डिजिटल मीडिया से जुड़े लोगों ने सरकार से मांग की है कि न्यूज़ पोर्टलों के लिए ऐसी विज्ञापन नीति बनाई जाए, जिससे छोटे और क्षेत्रीय डिजिटल मीडिया संस्थानों का संचालन संभव हो सके।

22 अगस्त 2026 को उत्तराखंड पत्रकार संगठन समन्वय समिति के संयोजक एवं पहाड़ों की गूंज के संपादक जीतमणि पैन्यूली ने सरकार से न्यूज़ पोर्टलों और वेब चैनलों को सरकारी विभागों की निविदाओं एवं विज्ञापनों में उचित अवसर देने की मांग की। उन्होंने करीब 1,800 न्यूज़ पोर्टलों की सूचीबद्धता की मांग का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले से सूचीबद्ध पोर्टलों को भी समय पर सरकारी विज्ञापन नहीं मिलने से उनके संचालन पर असर पड़ रहा है।
₹1,200 की दर पर उठे सवाल
डिजिटल मीडिया से जुड़े लोगों के बीच कथित रूप से ₹1,200 प्रतिमाह विज्ञापन राशि निर्धारित किए जाने को लेकर असंतोष है। हालांकि, इस राशि से संबंधित मूल सरकारी आदेश/अधिसूचना की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। इसलिए इस राशि को अंतिम सरकारी दर के रूप में प्रस्तुत करने से पहले संबंधित शासनादेश या सूचना विभाग के आदेश का सार्वजनिक होना महत्वपूर्ण है।
यदि ₹1,200 की दर वास्तव में लागू की गई है, तो पत्रकार संगठनों का सवाल है कि वर्तमान लागतों में किसी न्यूज़ पोर्टल के सर्वर, डोमेन, इंटरनेट, कैमरा, यात्रा, रिपोर्टिंग, संपादन और मानव संसाधन का खर्च इतनी राशि में कैसे पूरा होगा।
सरकार के अपने रिकॉर्ड में डिजिटल मीडिया के लिए विज्ञापन व्यवस्था
उत्तराखंड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग की वेबसाइट पर वर्ष 2026 के विभिन्न सरकारी विज्ञापनों की सूचनाएं उपलब्ध हैं। इनमें विभाग द्वारा सूचीबद्ध समाचार पत्रों एवं अन्य मीडिया माध्यमों के लिए विज्ञापन प्रकाशित किए जाने की जानकारी दर्ज है।
ऐसे में डिजिटल मीडिया संस्थानों का सवाल है कि सरकारी विज्ञापन नीति में न्यूज़ पोर्टलों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और मापनीय मानदंड क्यों न तय किए जाएं।
केवल विज्ञापन नहीं, पत्रकारिता के अस्तित्व का सवाल
न्यूज़ पोर्टल संचालकों का तर्क है कि डिजिटल पत्रकारिता आज उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों तक समाचार पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। स्थानीय पोर्टल सीमित संसाधनों में जिला, ब्लॉक और गांव स्तर की खबरें प्रकाशित करते हैं। ऐसे में विज्ञापन नीति का प्रभाव सीधे स्थानीय पत्रकारों और रिपोर्टिंग व्यवस्था पर पड़ता है।
पत्रकार संगठनों ने सरकार से मांग की है कि विज्ञापन दर तय करते समय पोर्टल की नियमितता, वास्तविक पहुंच, पाठक संख्या, कंटेंट की गुणवत्ता, पत्रकारों की संख्या, क्षेत्रीय कवरेज और डिजिटल ट्रैफिक जैसे पारदर्शी मानकों पर विचार किया जाए।
सरकार के सामने पांच बड़े सवाल
- न्यूज़ पोर्टलों के लिए निर्धारित विज्ञापन दर का आधिकारिक आधार क्या है?
- राज्य में कितने पोर्टल वास्तव में सूचीबद्ध हैं और कितने सूचीबद्धता की प्रक्रिया में हैं?
- पिछले तीन वर्षों में डिजिटल मीडिया को सरकारी विज्ञापनों पर कितनी राशि खर्च की गई?
- किन मानकों के आधार पर पोर्टलों को विज्ञापन दिया जाता है?
- क्या सरकार डिजिटल मीडिया के लिए अलग और पारदर्शी विज्ञापन नीति बनाने पर विचार करेगी?
डिजिटल मीडिया संगठनों की मांग है कि सरकार पत्रकार संगठनों और न्यूज़ पोर्टल संचालकों के साथ बैठक कर विज्ञापन नीति की समीक्षा करे। उनका कहना है कि मजबूत लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र और आर्थिक रूप से सक्षम स्थानीय पत्रकारिता जरूरी है।
नोट: ₹1,200 और करीब 1,700/1,800 पोर्टलों से जुड़े आंकड़ों में अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। प्रकाशन से पहले संबंधित सरकारी शासनादेश/विज्ञापन दर आदेश की प्रति से इन आंकड़ों का सत्यापन करना उचित होगा।
