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नई दिल्ली/देहरादून/कोटद्वार। कभी घरों की छतों, आंगन और दुकानों के आसपास आसानी से दिखाई देने वाली घरेलू गौरेया (House Sparrow) अब कई शहरों में पहले की तुलना में कम नजर आती है। इसके घटते अस्तित्व को लेकर सोशल मीडिया और विभिन्न रिपोर्टों में कई तरह के दावे सामने आते रहे हैं। इनमें एक दावा यह भी है कि भारत में पिछले पांच वर्षों में गौरेया की आबादी 97 प्रतिशत तक घट गई है और इसका प्रमुख कारण मोबाइल नेटवर्क टावरों से निकलने वाला विद्युतचुंबकीय विकिरण है।

लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़ों की पड़ताल इस दावे को पूरी तरह सही नहीं ठहराती।

क्या भारत में गौरेया की आबादी 97% कम हुई है?

State of India’s Birds 2025 के राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार भारत में घरेलू गौरेया की वर्तमान वार्षिक प्रवृत्ति गिरावट की ओर है। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी वर्तमान वार्षिक प्रवृत्ति लगभग -2.76 प्रतिशत दर्ज की गई है। वहीं दीर्घकालीन वार्षिक प्रवृत्ति -7.16 प्रतिशत बताई गई है, हालांकि दीर्घकालीन ट्रेंड को अध्ययन में “Trend Inconclusive” यानी निर्णायक नहीं माना गया है।

इसलिए “पिछले पांच वर्षों में गौरेया की आबादी 97 प्रतिशत कम हो गई” जैसा राष्ट्रीय दावा वर्तमान उपलब्ध आंकड़ों से प्रमाणित नहीं होता।

यह अंतर महत्वपूर्ण है। किसी विशेष शहर, कॉलोनी या स्थानीय सर्वेक्षण में 90 प्रतिशत से अधिक की गिरावट सामने आ सकती है, लेकिन उसे पूरे भारत की आबादी पर लागू नहीं किया जा सकता।

फिर गौरेया घट क्यों रही है?

वैज्ञानिक अध्ययनों में इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई संभावित कारण सामने आए हैं।

SACON यानी Salim Ali Centre for Ornithology and Natural History द्वारा 2018–2021 के दौरान किए गए अध्ययन में घरेलू गौरेया सहित मानव-आश्रित पक्षियों की स्थिति का अध्ययन किया गया। अध्ययन में गौरेया के घटने के संभावित कारणों में—

  • घोंसला बनाने की जगहों में कमी,
  • शहरीकरण,
  • कीट और अनाज जैसे प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता में कमी,
  • कीटनाशकों का इस्तेमाल,
  • वाहनों से होने वाला प्रदूषण,
  • बदलती शहरी संरचना

जैसे कारकों को महत्वपूर्ण माना गया।

अध्ययन में मोबाइल और दूरसंचार टावरों से निकलने वाले विद्युतचुंबकीय विकिरण को गौरेया की गिरावट का लोकप्रिय दावा बताया गया, लेकिन उपलब्ध प्रमाणों को अनिर्णायक माना गया।

क्या मोबाइल टावरों का कोई प्रभाव नहीं है?

यह कहना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि मोबाइल टावरों का पक्षियों पर प्रभाव बिल्कुल असंभव है।

विद्युतचुंबकीय विकिरण और पक्षियों के व्यवहार, दिशा-निर्धारण तथा प्रजनन पर संभावित प्रभाव को लेकर विभिन्न स्तरों पर शोध हुए हैं। भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के दस्तावेजों में भी इस विषय पर शोध और विशेषज्ञ समिति के गठन का उल्लेख मिलता है।

लेकिन यहां वैज्ञानिक निष्कर्ष और सार्वजनिक धारणा के बीच अंतर है।

“मोबाइल टावर गौरेया की संख्या घटने का एकमात्र कारण हैं”—इस निष्कर्ष के समर्थन में वर्तमान भारतीय प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं।

उत्तराखंड के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है यह सवाल

गौरेया पर उत्तराखंड में भी वैज्ञानिक अध्ययन हो चुका है। पर्यावरण मंत्रालय के दस्तावेजों में उत्तराखंड में House Sparrow की आबादी, वितरण और उसे प्रभावित करने वाले कारकों के अध्ययन का उल्लेख है। इसमें ग्रामीण, शहरी, वन एवं कृषि क्षेत्रों में सर्वेक्षण किया गया और मोबाइल टावरों की उपस्थिति सहित कई कारकों को रिकॉर्ड किया गया।

इससे स्पष्ट है कि समस्या को केवल मोबाइल टावरों तक सीमित करके देखना उचित नहीं है। पहाड़ी और मैदानी शहरों में बदलता भवन निर्माण, पारंपरिक घरों का खत्म होना, कृषि पद्धतियों में बदलाव और भोजन की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

गौरेया बचाने के लिए क्या किया जा सकता है?

गौरेया संरक्षण का सबसे व्यावहारिक तरीका उसके प्राकृतिक शहरी आवास को वापस उपलब्ध कराना है।

घरों और सार्वजनिक भवनों में sparrow nest boxes लगाए जा सकते हैं। बालकनी और छतों पर छोटे जलपात्र रखे जा सकते हैं तथा स्थानीय पक्षियों के लिए सुरक्षित दाना उपलब्ध कराया जा सकता है।

इसके साथ ही कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग को कम करना, स्थानीय वनस्पतियों को बढ़ावा देना और शहरी क्षेत्रों में छोटे हरित क्षेत्र बचाना भी महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

गौरेया का कम होना वास्तविक चिंता है, लेकिन इसके कारणों पर बात करते समय वैज्ञानिक प्रमाण और सोशल मीडिया दावों के बीच अंतर करना जरूरी है।

97 प्रतिशत की राष्ट्रीय गिरावट का दावा वर्तमान उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़ों से पुष्ट नहीं होता। दूसरी ओर, मोबाइल टावरों को गौरेया की गिरावट का एकमात्र या निर्णायक कारण मानने के लिए भी पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

असल सवाल शायद यह है कि हमने अपने शहरों और घरों को गौरेया के लिए कितना अनुकूल रहने दिया है?

गौरेया को बचाने की लड़ाई केवल मोबाइल टावरों के खिलाफ नहीं, बल्कि ऐसे शहरी विकास मॉडल के खिलाफ भी है जिसमें पक्षियों के लिए घोंसला, भोजन, पानी और सुरक्षित आवास लगातार कम होते जा रहे हैं।


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By udaen

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