देहरादून 2 अगस्त 025,
बस्ती बचाओ आन्दोलन के प्रतिनिधिमण्डल ने नगरनिगम मेयर श्री सौरभ थपलियाल से भेंटकर उन्हें ज्ञापन सौंपा तथा कहा कि कोई भी परियोजना लागू करने से पहले जनसुनवाई होती तथा प्रभावित जनता की सहमति के बाद परियोजना लागू की जाती किन्तु एलिवेटेड रोड़ के सन्दर्भ में रिस्पना-बिंदाल के प्रभावितों से जनसुनवाई करने के बजाय परियोजना हेतु मकानों की ध्वस्तीकरण हेतु चिन्ह लगाय गये तथा पुर्नवास ,मुआवजे की व्यवस्था करने के बजाय प्रशासन द्वारा सीधे जन सुनवाई तिथियां घोषित की गई ।प्रतिनिधि मण्डल ने माननीय मेयर को अवगत कराया कि केवल 868 गरीबों को हटाकर रिस्पना-बिंदाल का प्लडजोन साफ नहीं किया जा सकता जबकि इस जोन सरकारी भवन,निजी संस्थान तथा रसूखदारों के कब्जे हों।प्रतिनिधि मण्डल मेयर को अवगत कराया अधिकारी हाईकोर्ट में अनुचित तथ्य देकर गरीबों को टारगेट कर रहे हैं ,साथ हि कहा सरकार द्वारा हाईकोर्ट में प्लडजोन खाली करने कि बात की जा रही तथा दूसरी ओर इस प्लडजोन में पर्यावरण विरोधी एलिवेटेड रोड़ योजना स्वीकृत कर गरीबों के बिस्थापन कि तैयारी कर रही है जो कि ठीक नही है ।मेयर नगरनिगम ने उचित कार्यवाही का आश्वासन दिया ।
प्रतिनिधि मण्डल में बस्ती बचाओ आन्दोलन के संयोजक अनन्त आकाश ,सीआईटीयू के जिला महामंत्री लेखराज,भगवन्तं पयाल ,रविंद्र नौडियाल,विप्लव अनन्त आदि मौजूद थे।
ज्ञापन सलग्न
सेवामें ,
माननीय श्री सौरभ थपलियाल जी
महापौर नगरनिगम देहरादून
बिषय :- नगरनिगम द्वारा भेजे गये 864 नोटिसों एवं रिस्पना-बिंदाल के ऊपर एलिवेटेड रोड़ से हो रहे बिस्थापन के सन्दर्भ में ।
मान्यवर ,
बस्ती बचाओ आन्दोलन की ओर से उपरोक्त बिषय के सन्दर्भ में आपका ध्यान आकर्षित करते हुऐ निवेदन करना है कि बस्तियों को न हटाने एवं बस्तियों को मालिकाना हक आपकी एवं उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामीजी की प्रतिबद्धता रही है , जिस कारण बस्तीवासियों द्वारा लोकसभा, विधानसभा तथा स्थानीय निकाय चुनावों भारी मतों से बिजयी बनाया गया, किन्तु चुनाव के तुरंत बाद नगरनिगम द्वारा हाईकोर्ट एवं एनजीटी के बहाने चुन चुनकर गरीबों को नोटिस भेजे गये जैसाकि सर्वविदित है कि हाईकोर्ट में एकतरफा सूचनाऐं अधिकारियों द्वारा भेजी गई है जो कि भेदभावपूर्ण नीति को ही दर्शाता है चन्द गरीब परिवारों को बेदखल कर रिस्पना-बिंदाल के प्लडजोन को साफ नहीं किया जा सकता जबकि इन नदियों के आसपास रसूखदारों की बहुमंजिली इमारतें,कब्जे तथा विधानसभा सहित अनेक सरकारी गैर सरकारी तथा औधोगिक क्षेत्र का एक हिस्सा बसा है । आज भी शहर का अधिकांश कचड़ा ,सिविरेज रिस्पना-बिंदाल में डम्प होता हो है जिसपर माननीय हाईकोर्ट में हमारी ओर से पक्ष रखा जा रहा है ।
मान्यवर ,बस्ती बचाओ कि आन्दोलन उत्तराखण्ड देहरादून उत्तराखण्ड हाईकोर्ट एवं एलिवेटेड रोड़ से के चलते रिस्पना-बिंदाल प्रभावितों के प्रति प्रमुख चिंताएं हैं :-
(1)चयनात्मक बेदखली का अन्याय**
- गरीबों को निशाना: 864+ गरीब परिवारों (जिन्हे यह कहकर मुख्यतः 2016 के बाद बसे) को बेदखली नोटिस भेजे गए।
- रसूखदारों को छूट: उसी बाढ़ क्षेत्र में बने सरकारी भवनों/प्रभावशाली लोगों के अतिक्रमणों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई,
(2) एलिवेटेड रोड परियोजना में गड़बड़ी**
- जनसुनवाई मात्र औपचारिकता :
- परियोजना का डिजाइन, भूमि अधिग्रहण और घरों पर “बिस्थापन चिह्न” पहले ही लगा दिए गए। अब जनता की राय मांगना नियमों कै बिरूध्द है।
- पर्यावरण नियमों का उल्लंघन: बिना पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और वास्तविक सार्वजनिक सहमति के कार्य शुरू करने की तैयारी।
(3) कानूनी पेचीदगियां*
- हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना: कोर्ट ने सभी अतिक्रमण हटाने + सीसीटीवी लगाने का आदेश दिया था, पर सरकार ने केवल कमजोर वर्ग को निशाना बनाया।
- पुनर्वास का अभाव: बेदखल किए जाने वाले सभी प्रभावित परिवारों के लिए कोई पुनर्वास योजना प्रस्तुत नहीं की गई है।जबकि प्रभावशाली लोगों कै लिए सरकार पहले ही पैकेज तैयार रखती है ,आढ़त बाजार शिफ्टिंग ,चकरोता चौड़ीकरण इसका उदाहरण है जहाँ पर किरायेदारों। कब्जैदारों थोडी जगह कै बदले कीमती दुकानें मिली वै आज भी दोनों स्थानों पर रोजगार कर रहे हैं ।
(4) विकास बनाम न्याय का संघर्ष**
- विरोधाभास: बाढ़ जोखिम को रोकने के नाम पर गरीबों को हटाया जा रहा है, लेकिन उसी संवेदनशील क्षेत्र में ₹6,200 करोड़ की भारी-भरकम एलिवेटेड रोड बनाई जाएगी जो नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाएगी।
हमारा मानना है कि :यातायात सुधारने एवं पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सड़कों एवं यातायात की सुविधाओं में व्यापक सुधार होना चाहिए , बेघर हो रहे नागरिकों की लगातार उपेक्षा हो रही है और उनकी सुनवाई होनी चाहिए वै क्या चाहते हैं । हमारा मानना है कि गरीबों को बेदखल करना, जबकि सरकारी/शक्तिशाली अतिक्रमण बरकरार रखना। जनसुनवाई परियोजना मंजूर होने के बाद करना नागरिक अधिकारों का मखौल उड़ाने कै समान है और बिना मुआवजा या पुनर्वास योजना के लोगों को बेघर करना भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 एवं सर्वोच्च न्यायालय कै दिशानिर्देशों का उल्लंघन है ।
हम आपसे मांग करते हैं कि :-
- बेदखली रोको: जब तक सभी अतिक्रमणों (सरकारी/निजी) पर समान कार्रवाई न हो और सभी के लिए पुनर्वास योजना स्वीकृत न हो।
- वास्तविक जनसुनवाई: परियोजना को फिर से डिजाइन चरण में ले जाकर प्रभावितों की सहमति लेने जरूरी हो।
- प्रभावित सभी परिवारों के लिए मुआवजा नीति सार्वजनिक किया जाना चाहिए सभी पट्टाधारकों, कब्जाधारियों तथा रजिस्ट्री धारियों को समान रूप सले मुआवजा एवं पुर्नवास किया जाये ।
अत : मान्यवर से हमारा कहना है कि बिना नागरिक अधिकारों का सम्मान किए कोई भी विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। सरकार को सबसे पहले प्रभावित समुदायों के साथ ईमानदारी से बातचीत शुरू कर समस्या का उचित समाधान निकालना चाहिए ।
आशा है कि आप उपरोक्त बिन्दुओं का अवलोकन कर न्यायोचित कार्यवाही करेंगे ।
धन्यवाद सहित
भवदीय
(अनन्त आकाश)
संयोजक
