महात्मा गांधी के विचार उनसे मिले संस्कारों की पूंजी से आज भी युवा पीढ़ी पोषित हो रही है। समाज की रगों में उनके विचारों की ऊर्जा बह रही है। जो हर परिवेश को पुष्पित पल्लवित कर रही है। गांधी से सभी वैचारिक संस्कार तो लिए लेकिन जब-जब आंदोलन की बात आई उनके जैसे शांतिपूर्ण विरोध की नजीर कोई नहीं पेशकर सका। उनके मौन आंदोलन की लाठी कोई नहीं थाम सका। दिल्ली भी महात्मा गांधी के खिलाफत…आत्मशुद्धि…असहयोग… सविनय जैसे कई आंदोलन व उपवास की गवाह बनी। उसमें शरीक हुई। भले आज के आंदोलनों में दिल्ली वैसे पेश न आए लेकिन उस वक्त गांधी जी के साथ चली। सबरंग के इस अंक में गांधी की राजनीतिक यात्रा में दिल्ली का क्या रहा स्थान इसी से रूबरू होंगे।
