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देहरादून, 17 अगस्त 2026। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय संस्था ‘संवेदना’ के तत्वावधान में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सहयोग से सोमवार को दून पुस्तकालय के सभागार में ‘समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां’ विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। गोष्ठी में साहित्यकारों ने बदलते सामाजिक परिवेश, तकनीक और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, पाठकों के बदलते रुझान तथा कहानी के नए शिल्प को लेकर विस्तार से विचार-विमर्श किया।

गोष्ठी की अतिथि वक्ता और कथाक्रम पत्रिका, लखनऊ की उप संपादक डॉ. रजनी गुप्त ने कहा कि समकालीनता केवल किसी विशेष कालखंड का नाम नहीं, बल्कि उस दौर के जीवन-यथार्थ से रचनाकार के जीवंत जुड़ाव का भी नाम है। आज की कहानी ऐसी होनी चाहिए जिसमें आम पाठक को अपने जीवन, अपने संबंधों और अपने आसपास की सामाजिक परिस्थितियों की झलक दिखाई दे।

उन्होंने कहा कि समकालीन कहानी में विषयों की विविधता के साथ दिन-ब-दिन जटिल होते जा रहे रिश्तों और जीवन के बहुआयामी संबंधों से मुठभेड़ दिखाई देनी चाहिए। ऐसी रचना पाठक को केवल मनोरंजन न दे, बल्कि उसे पढ़कर जीवन से संघर्ष करने और आगे बढ़ने का हौसला भी मिले।

डॉ. गुप्त ने कहा कि विषय नए और प्रयोगधर्मी हो सकते हैं, लेकिन उनकी प्रस्तुति इतनी दुरूह नहीं होनी चाहिए कि सामान्य पाठक रचना से ही कट जाए। उन्होंने गीतांजलि श्री के बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास ‘रेत समाधि’ का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रयोग और पठनीयता के बीच संतुलन साहित्य की बड़ी चुनौती है।

उन्होंने कहा कि तेज रफ्तार जीवन में समय का संकट भी पाठकीयता को प्रभावित कर रहा है। रचनारत कई पीढ़ियों के लेखक मौजूदा दौर के बहुरूपी दबावों और बाजार से पैदा हुई समस्याओं का सामना कर रहे हैं। कहानी का प्रकाशन बड़ी संख्या में हो रहा है, लेकिन क्या उसी अनुपात में पाठकों की संख्या बढ़ रही है, यह गंभीर प्रश्न है। कई बार सामान्य पाठक एक जैसी रचनात्मक शैली और विषयों के दोहराव से ऊबने की शिकायत भी करते हैं।

डॉ. रजनी गुप्त ने कहा कि लगभग दो दशक के सामाजिक जीवन को रचनाओं में समेटना आसान नहीं है। आज हिंदी कहानी में कई पीढ़ियों के लेखक एक साथ सक्रिय हैं। ऐसे में आम पाठक के सामने यह सवाल भी है कि वह किसे पढ़े, किसे न पढ़े और पढ़ने के बाद उसे हासिल क्या हुआ। यही प्रश्न कहानीकार के सामने भी मौजूद है।

उन्होंने कहा कि आज प्रत्येक लेखक पठनीयता के दबाव और नए शिल्प की तलाश के बीच जूझ रहा है। लंबे समय से लिख रहे कई रचनाकारों ने भी अपनी स्थापित सीमाओं को तोड़ने का प्रयास किया है, जबकि कुछ युवा लेखक नव्यता के अति उत्साह में अपनी ही शैली की पुनरावृत्ति के शिकार होकर अपेक्षाकृत कम समय में एकरस यानी ‘मोनोटोनस’ हो गए। समकालीन हिंदी कहानी के परिदृश्य में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं।

‘आलापचारी’ का लोकार्पण

गोष्ठी के अवसर पर डॉ. रजनी गुप्त की पुस्तक ‘आलापचारी’ का लोकार्पण भी किया गया। पुस्तक लोकार्पण के बाद कहानी की वर्तमान स्थिति, उसके कथ्य और पाठक के साथ उसके संबंध पर चर्चा आगे बढ़ी।

गोष्ठी के अध्यक्ष और हाल ही में उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा ‘साहित्य भूषण’ सम्मान से सम्मानित साहित्यकार जितेन ठाकुर ने कहा कि “पठनीयता किसी भी रचना की रीढ़ होती है।” इसी के सहारे कोई रचना एक पाठक से दूसरे पाठक तक और फिर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है।

उन्होंने स्वीकार किया कि साहित्य ने पाठकों का एक बड़ा प्रतिशत खोया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पाठक पूरी तरह समाप्त हो गया है। आज भी पाठक मौजूद है और साहित्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस पाठक को बचाए रखना है।

जितेन ठाकुर ने कहा कि प्रायोजित चर्चाओं और साहित्यिक विमर्श के कृत्रिम स्वरूप ने साहित्य का अहित किया है। इन चुनौतियों के बीच कहानी विधा को समाज के लिए उपयोगी बनाए रखना जरूरी है। कहानीकारों और साहित्यिक संस्थाओं को इन चुनौतियों का लगातार सामना करना होगा और उनसे पार पाने के प्रयास करने होंगे। उनके अनुसार यह काम लेखन शुरू करने से भी पहले साहित्यकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल होना चाहिए।

तकनीक और सोशल मीडिया ने बदला पाठक का संसार

गोष्ठी का संचालन डॉ. विद्या सिंह ने किया। उन्होंने विषय पर प्रारंभिक आधार वक्तव्य रखते हुए कहा कि आज के दौर में जीवन का लगभग हर क्षेत्र तेजी और तकनीक से प्रभावित है। ऐसे में कहानी लिखना ही नहीं, बल्कि उसे उसके मूल तत्वों के साथ पाठक तक पहुंचाना और पाठक को प्रभावित करना भी कठिन होता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि तकनीक, सोशल मीडिया, समय का अभाव, युवा वर्ग में बदलती पठन-पाठन की आदतें और रोजगार के लिए बढ़ती जद्दोजहद ने एक नया सामाजिक परिवेश तैयार किया है। ऐसे माहौल में पुस्तक के रूप में अथवा सोशल मीडिया के माध्यम से कहानी को पाठक तक पहुंचाने के लिए नए रास्तों की तलाश आवश्यक है।

डॉ. विद्या सिंह ने कहा कि चुनौती यह है कि इन बदलावों के बीच कहानी की सामाजिक और मानवीय उपयोगिता को कैसे बनाए रखा जाए। मनुष्य के बहुआयामी विकास में कहानी की भूमिका और उसके प्रभाव को अक्षुण्ण रखना आज पहले से कहीं अधिक जरूरी है।

पांच दशक से साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय ‘संवेदना’

कार्यक्रम की शुरुआत दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के चंद्रशेखर तिवारी द्वारा उपस्थित साहित्यकारों और अतिथियों के स्वागत के साथ हुई। संवेदना संस्था के संयोजक समदर्शी बड़थ्वाल ने संस्था की गतिविधियों और उसके साहित्यिक-सामाजिक योगदान पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि ‘संवेदना’ पिछले पांच दशक से अधिक समय से देहरादून में साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय है। प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को संस्था की नियमित गोष्ठी आयोजित होती है, जिसमें रचनाकार अपनी अप्रकाशित रचनाएं साथियों के सामने प्रस्तुत करते हैं और प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर उनमें आवश्यक परिमार्जन करते हैं।

संस्था साहित्यिक गतिविधियों के साथ कला, संस्कृति और समसामयिक सामाजिक मुद्दों से जुड़े कार्यक्रमों, जन आंदोलनों और सामाजिक कार्यों में भी भागीदारी करती रही है।

साहित्यकारों की रही सक्रिय भागीदारी

गोष्ठी में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के डी.के. पांडे, सुंदर सिंह बिष्ट सहित संवेदना के साथी डॉ. जितेंद्र भारती, डॉ. राजेश पाल, डॉ. आशुतोष सिंह, शशि भूषण बडोनी, डॉ. लालता प्रसाद, डॉली डबराल, सुधा थपलियाल, डॉ. इंदु पांडे, सुधा जुगरान, सरोजनी नौटियाल, यामा शर्मा, नीलमप्रभा वर्मा, निशा अतुल्य, रजनीश त्रिवेदी, शिवमोहन सिंह, संजीव घिल्डियाल, कुसुम भट्ट, डॉ. घनश्याम सिंह, तन्मय ममगाईं, कल्पना बहुगुणा, मंजू कला, दिनेश चंद्र जोशी सहित अनेक साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

कहानी के सामने मूल सवाल

गोष्ठी से उभरकर सामने आया कि समकालीन कहानी के सामने चुनौती केवल नए विषय खोजने की नहीं है। असली चुनौती यह है कि बदलते समाज के अनुभवों को इस तरह रचा जाए कि प्रयोगधर्मिता, साहित्यिक गुणवत्ता और पठनीयता के बीच संतुलन बना रहे।

तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में पाठक का ध्यान पहले से अधिक बंटा हुआ है। ऐसे समय में कहानी को पाठक तक पहुंचाने के माध्यम भले बदल रहे हों, लेकिन मनुष्य के अनुभव, संघर्ष, संबंध और संवेदना की जरूरत समाप्त नहीं हुई है। संभवतः समकालीन कहानी की सबसे बड़ी परीक्षा भी यही है—वह बदलते समय को कितनी गहराई से पकड़ती है और पाठक को अपने समय तथा अपने जीवन से कितनी ईमानदारी से जोड़ पाती है।


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By udaen

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