संपादकीय: ‘कैच द रेन’—क्या हर वर्ष मानसून के साथ ही जागेगी हमारी जल चेतना?
बारिश की पहली बूंद जहां किसानों के चेहरे पर मुस्कान लाती है, वहीं शहरों में जलभराव और पहाड़ों में भूस्खलन की खबरें सुर्खियां बन जाती हैं। कुछ ही महीनों बाद यही देश पानी की कमी, सूखते जलस्रोत और गिरते भूजल स्तर की चिंता में डूब जाता है। यह विरोधाभास प्राकृतिक नहीं, बल्कि हमारी जल प्रबंधन व्यवस्था और सामाजिक सोच की विफलता का परिणाम है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए “कैच द रेन” अभियान एक बार फिर देश के सामने जल संरक्षण का संदेश लेकर आया है। इसका मूल मंत्र—“जहां भी गिरे, जब भी गिरे, वर्षा जल को संजोएं”—सिर्फ एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि भारत के जल भविष्य का आधार बन सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह अभियान सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित रहेगा या वास्तव में जन आंदोलन का रूप ले पाएगा?
भारत को प्रकृति ने भरपूर वर्षा का वरदान दिया है। औसतन अधिकांश क्षेत्रों में इतनी बारिश होती है कि यदि उसका एक बड़ा हिस्सा भी वैज्ञानिक तरीके से संग्रहित किया जाए, तो पेयजल, सिंचाई और भूजल पुनर्भरण की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। दुर्भाग्य से हमारे अधिकांश शहरों और गांवों में वर्षा जल बिना उपयोग के बहकर नालों, नदियों और अंततः समुद्र तक पहुंच जाता है।
स्थिति और गंभीर इसलिए भी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन ने वर्षा के स्वरूप को बदल दिया है। कहीं अत्यधिक बारिश होती है, तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है। ऐसे समय में वर्षा जल संचयन अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।
उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा संदेश
उत्तराखंड को नदियों का उद्गम स्थल कहा जाता है। गंगा और यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियां यहीं से निकलती हैं, फिर भी राज्य के अनेक गांव गर्मियों में पेयजल संकट झेलते हैं। यह केवल प्राकृतिक समस्या नहीं, बल्कि पारंपरिक जल संरचनाओं की उपेक्षा का परिणाम भी है।
कभी गांवों की पहचान रहे नौले, धारे, चाल-खाल और प्राकृतिक जलस्रोत आज या तो सूख चुके हैं या अतिक्रमण और उपेक्षा का शिकार हैं। पहाड़ों में वर्षा का अधिकांश पानी तेज़ी से ढलानों से नीचे उतर जाता है, जिससे एक ओर भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ता है, तो दूसरी ओर भूजल पुनर्भरण नहीं हो पाता।
यदि प्रत्येक गांव में छोटे जलाशय, चेक डैम, रिचार्ज पिट, कंटूर ट्रेंच और छत आधारित वर्षा जल संचयन प्रणाली विकसित की जाए, तो यह न केवल जल संकट कम करेगा बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को भी घटा सकता है।
केवल सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार
जल संरक्षण का दायित्व केवल सरकार का नहीं हो सकता। जिस प्रकार स्वच्छता अभियान तब सफल हुआ जब वह जनभागीदारी का आंदोलन बना, उसी प्रकार “कैच द रेन” को भी प्रत्येक नागरिक का अभियान बनाना होगा।
नगर निकायों को नए भवनों में वर्षा जल संचयन अनिवार्य करना चाहिए। ग्राम पंचायतों को अपने विकास बजट का एक हिस्सा जल संरक्षण के लिए निर्धारित करना चाहिए। विद्यालयों में वर्षा जल संचयन को व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उद्योगों और संस्थानों को भी जल पुनर्भरण की जिम्मेदारी निभानी होगी।
विकास की नई परिभाषा
आज विकास का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें और बड़े प्रोजेक्ट नहीं हो सकता। यदि विकास के साथ जल संरक्षण नहीं जुड़ा, तो आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा संकट पानी का होगा। किसी भी शहर या गांव की वास्तविक समृद्धि उसके जल स्रोतों की स्थिरता से मापी जानी चाहिए।
निष्कर्ष
हर मानसून हमें यह अवसर देता है कि हम भविष्य के लिए पानी बचा लें। यदि हम आज भी वर्षा की हर बूंद को बह जाने देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी। “कैच द रेन” एक सरकारी अभियान से कहीं अधिक एक राष्ट्रीय दायित्व है। आवश्यकता इस बात की है कि इसे कागजों से निकालकर घर-घर, गांव-गांव और शहर-शहर तक पहुंचाया जाए।
जल संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक विकास और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का प्रश्न है। वर्षा की हर बूंद बचाना ही भविष्य को सुरक्षित करना है।
