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संपादकीय | राष्ट्रीय विमर्श

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के बहाने भारत में स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की नई परिभाषा

“किसी भी राष्ट्र की सभ्यता का सबसे बड़ा पैमाना यह नहीं कि वह अपने सबसे शक्तिशाली नागरिकों के लिए क्या करता है, बल्कि यह कि वह अपने सबसे अधिक सहयोग की आवश्यकता रखने वाले नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।”

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है। विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा कर रहा है। डिजिटल क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष विज्ञान और वैश्विक निवेश की चर्चा हर मंच पर हो रही है। लेकिन इस विकास यात्रा के बीच एक ऐसा भारत भी है, जिसकी आवाज़ अक्सर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा नहीं बन पाती। यह उन लाखों लोगों का भारत है जो किसी न किसी दुर्लभ बीमारी, विशेषकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, के साथ जीवन जी रहे हैं।

उनका संघर्ष केवल बीमारी से नहीं है। उनका संघर्ष व्यवस्था से है, पहुंच की कमी से है, महंगे उपचार से है, सामाजिक पूर्वाग्रहों से है और सबसे बढ़कर उस सोच से है जो आज भी शारीरिक क्षमता को ही व्यक्ति की योग्यता मान बैठी है।

विकास का असली पैमाना

सड़कें बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन ऐसी सड़कें बनाना कठिन है जिन पर व्हीलचेयर भी सम्मान के साथ चल सके।

भवन बनाना आसान है, लेकिन उन्हें सभी के लिए सुलभ बनाना दूरदृष्टि मांगता है।

कानून बनाना आसान है, लेकिन उन्हें व्यवहार में लागू करना सुशासन की असली परीक्षा है।

यदि किसी दिव्यांग व्यक्ति को किसी सरकारी कार्यालय तक पहुंचने के लिए दूसरों की गोद का सहारा लेना पड़े, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत कठिनाई नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की विफलता है।

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी: बीमारी से अधिक सामाजिक चुनौती

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी एक प्रगतिशील आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें समय के साथ मांसपेशियां कमजोर होती जाती हैं। इसके कारण चलना, बैठना, सीढ़ियां चढ़ना, हाथों का उपयोग करना और कई मामलों में सांस लेना भी कठिन हो सकता है।

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी नीतियां इस बीमारी से प्रभावित व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर देती हैं?

यदि उत्तर “आंशिक” है, तो सुधार की गुंजाइश अभी बहुत बड़ी है।

दुर्लभ रोगों को स्वास्थ्य नीति के केंद्र में लाना होगा

भारत में लंबे समय तक स्वास्थ्य नीति का ध्यान संक्रामक रोगों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और सामान्य बीमारियों पर केंद्रित रहा। यह आवश्यक भी था। किंतु अब समय बदल चुका है।

दुर्लभ रोग, आनुवंशिक विकार और दीर्घकालिक न्यूरो-मस्कुलर बीमारियां सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण विषय बन चुकी हैं। इनके उपचार की लागत अत्यधिक है, विशेषज्ञ सीमित हैं और जागरूकता अपेक्षाकृत कम है।

इसलिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में दुर्लभ रोगों के लिए दीर्घकालिक वित्तीय, चिकित्सकीय और सामाजिक ढांचा विकसित करना समय की मांग है।

उत्तराखंड जैसे राज्यों की विशेष चुनौती

पर्वतीय राज्यों में समस्या और जटिल हो जाती है। गांवों से जिला मुख्यालय तक पहुंचना कठिन है, और वहां से महानगरों तक उपचार के लिए जाना कई परिवारों के लिए आर्थिक रूप से असंभव हो जाता है।

ऐसे राज्यों में टेलीमेडिसिन, मोबाइल पुनर्वास इकाइयों, जिला स्तरीय फिजियोथेरेपी केंद्रों, आनुवंशिक परामर्श सेवाओं और समुदाय आधारित पुनर्वास मॉडल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह केवल स्वास्थ्य सेवा का विस्तार नहीं होगा, बल्कि क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम होगा।

समावेशन को ‘कल्याण’ नहीं, ‘अधिकार’ के रूप में देखना होगा

दिव्यांगता के प्रति हमारी सोच में सबसे बड़ा परिवर्तन यहीं आवश्यक है।

समाज को दया की नहीं, अधिकारों की भाषा सीखनी होगी।

किसी भवन में रैंप बनाना उपकार नहीं है।

ब्रेल संकेतक लगाना दान नहीं है।

सुगम वेबसाइट बनाना अतिरिक्त सुविधा नहीं है।

यह सब समान नागरिक अधिकारों का हिस्सा है।

जब तक समावेशन को संवैधानिक दायित्व नहीं माना जाएगा, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं होगा।

स्वास्थ्य से आगे की लड़ाई

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी केवल अस्पताल का विषय नहीं है।

यह शिक्षा का विषय है।

यह रोजगार का विषय है।

यह सामाजिक न्याय का विषय है।

यह शहरी नियोजन का विषय है।

यह डिजिटल भारत का विषय है।

यह आर्थिक नीति का विषय है।

यदि कोई युवा ऑनलाइन काम कर सकता है, लेकिन उसके पास आवश्यक सहायक तकनीक नहीं है, तो यह तकनीकी नहीं, नीतिगत विफलता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सहायक तकनीक: नई उम्मीद

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, स्मार्ट व्हीलचेयर, वॉयस-आधारित कंप्यूटिंग, आई-ट्रैकिंग सिस्टम और डिजिटल संचार उपकरण दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहे हैं।

भारत यदि इस क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और विनिर्माण को बढ़ावा देता है, तो वह न केवल अपने नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता सुधार सकता है, बल्कि वैश्विक सहायक तकनीक उद्योग में भी अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

मीडिया को बदलनी होगी भाषा

दिव्यांग व्यक्तियों को “बेचारा”, “लाचार” या “प्रेरणा की मूर्ति” जैसे सीमित फ्रेम में प्रस्तुत करना भी एक प्रकार का पूर्वाग्रह है।

मीडिया का उद्देश्य उन्हें सामान्य नागरिक के रूप में प्रस्तुत करना होना चाहिए—ऐसे नागरिक जिनके अधिकार, सपने, संघर्ष और उपलब्धियां अन्य सभी नागरिकों की तरह महत्वपूर्ण हैं।

संवेदनशील पत्रकारिता समाज की सोच बदलने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।

नीति के स्तर पर आवश्यक कदम

यदि भारत वास्तव में समावेशी राष्ट्र बनना चाहता है, तो निम्नलिखित सुधारों पर गंभीरता से विचार करना होगा—

  • दुर्लभ रोगों के लिए राष्ट्रीय वित्तीय सहायता कोष का विस्तार।
  • प्रत्येक राज्य में न्यूरो-मस्कुलर उत्कृष्टता केंद्र।
  • आनुवंशिक परीक्षण और परामर्श की सुलभ व्यवस्था।
  • पुनर्वास सेवाओं का जिला स्तर तक विस्तार।
  • सहायक उपकरणों के स्वदेशी निर्माण को प्रोत्साहन।
  • सार्वभौमिक सुगम्यता मानकों का कठोर अनुपालन।
  • समावेशी शिक्षा और कौशल विकास का विस्तार।
  • निजी क्षेत्र में समावेशी रोजगार नीति को प्रोत्साहन।
  • परिवारों और देखभालकर्ताओं के लिए सामाजिक सुरक्षा।
  • दिव्यांगता संबंधी विश्वसनीय राष्ट्रीय डेटा और शोध को मजबूत करना।

समाज की भूमिका

कानून बदलाव की शुरुआत कर सकता है, लेकिन समाज उसे स्थायी बनाता है।

हर विद्यालय यदि एक बच्चे का हाथ थाम ले, हर संस्था यदि एक अवसर दे दे, हर नगर यदि एक बाधा हटा दे और हर नागरिक यदि अपनी भाषा में सम्मान जोड़ दे, तो लाखों लोगों का जीवन बदल सकता है।

समावेशन किसी एक मंत्रालय का कार्यक्रम नहीं है; यह पूरे समाज की संस्कृति है।

निष्कर्ष: विकसित भारत का वास्तविक अर्थ

भारत तब विकसित नहीं होगा जब केवल उसके शहर स्मार्ट बन जाएंगे।

भारत तब विकसित होगा जब किसी व्हीलचेयर पर बैठा बच्चा बिना किसी सहायता के अपने विद्यालय पहुंच सके।

जब किसी दुर्लभ रोग से पीड़ित परिवार को इलाज के लिए घर न बेचना पड़े।

जब किसी युवा की नियुक्ति उसकी योग्यता से तय हो, उसकी शारीरिक स्थिति से नहीं।

जब समाज व्यक्ति की पहचान उसकी बीमारी से नहीं, उसके व्यक्तित्व से करे।

यही विकसित भारत का मानवीय चेहरा होगा।

याद रखिए—

मांसपेशियों की शक्ति सीमित हो सकती है, लेकिन मानवीय इच्छाशक्ति असीमित होती है।

बीमारी शरीर को प्रभावित कर सकती है, लेकिन अवसरों का अभाव पूरे समाज को कमजोर कर देता है।

इसलिए आज आवश्यकता केवल चिकित्सा की नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन, समावेशी विकास और मानवीय दृष्टिकोण की है।

क्योंकि अंततः किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह अपने प्रत्येक नागरिक को—चाहे उसकी शारीरिक क्षमता कुछ भी हो—सम्मान, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार सुनिश्चित करे।


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By udaen

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