क्या दुनिया सात बड़े संकटों के दौर में प्रवेश कर रही है?
एक समय था जब यह माना जाता था कि वैश्वीकरण, मुक्त व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ दुनिया को अधिक स्थिर बनाएँगी। यह विश्वास था कि यदि कोई देश आर्थिक या राजनीतिक संकट में फँसता है, तो वैश्विक व्यवस्था उसे संभाल लेगी। लेकिन 2026 की दुनिया एक अलग कहानी कह रही है। आज विश्व एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है जहाँ संकट स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।
यदि यूक्रेन, फ्रांस, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नाइजीरिया, इथियोपिया और अर्जेंटीना जैसे देशों को एक साथ देखा जाए, तो एक समान कारण नहीं दिखता। बल्कि प्रत्येक देश वैश्विक अस्थिरता के अलग-अलग चेहरे को सामने लाता है।
यूक्रेन युद्ध का प्रतीक है, जहाँ एक क्षेत्रीय संघर्ष ने पूरी दुनिया की ऊर्जा, खाद्यान्न और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर दिया। फ्रांस यह दिखाता है कि विकसित लोकतंत्र भी राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक दबाव और जन असंतोष से अछूते नहीं हैं। पाकिस्तान लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक निर्भरता के दुष्चक्र में फँसा हुआ है। बांग्लादेश राजनीतिक संक्रमण और आर्थिक दबावों के बीच नई दिशा खोज रहा है। नाइजीरिया तेज़ी से बढ़ती आबादी, महँगाई और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। इथियोपिया आंतरिक संघर्षों और क्षेत्रीय तनावों का केंद्र बन चुका है। वहीं अर्जेंटीना कट्टर आर्थिक सुधारों के एक ऐसे प्रयोग से गुजर रहा है, जिसकी सफलता और विफलता दोनों के दूरगामी परिणाम होंगे।
इन सभी उदाहरणों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि आज संकट केवल आर्थिक नहीं रहे। अब राजनीति, समाज, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, प्रवासन और तकनीकी प्रतिस्पर्धा एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। किसी एक क्षेत्र में उत्पन्न अस्थिरता कुछ ही समय में दूसरे महाद्वीप तक पहुँच जाती है।
फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि ये सभी देश “पतन के कगार” पर खड़े हैं। संकट और राज्य के पूर्ण पतन में अंतर होता है। कई देशों के पास मजबूत संस्थाएँ, संसाधन, अंतरराष्ट्रीय साझेदार और समाज की लचीलापन क्षमता अभी भी मौजूद है। इसलिए भविष्य निश्चित नहीं है।
वास्तविक चिंता यह है कि वैश्विक व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक विभाजित हो चुकी है। महाशक्तियाँ सहयोग से अधिक प्रतिस्पर्धा में लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ रहे हैं। आर्थिक राष्ट्रवाद बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन नई चुनौतियाँ पैदा कर रहा है। ऐसे में संकटग्रस्त देशों के लिए बाहरी सहायता पहले जितनी सहज नहीं रह गई है।
दुनिया आज शीत युद्ध जैसी दो ध्रुवीय व्यवस्था में नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय प्रतिस्पर्धा के युग में प्रवेश कर चुकी है। इस युग में कोई भी देश—चाहे वह विकसित हो या विकासशील—स्थिरता की गारंटी नहीं दे सकता। इसलिए सरकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि संस्थागत मजबूती, सामाजिक विश्वास, सुशासन और संकटों से निपटने की क्षमता विकसित करना है।
इतिहास बताता है कि सभ्यताओं का पतन अचानक नहीं होता; वह लंबे समय तक अनदेखे रहे आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संकटों का परिणाम होता है। आज दुनिया एक ऐसे ही मोड़ पर खड़ी है। प्रश्न यह नहीं कि कौन-सा देश अगला संकट झेलेगा, बल्कि यह है कि क्या वैश्विक नेतृत्व समय रहते सहयोग और सुधार का रास्ता चुन पाएगा, या फिर दुनिया और अधिक विभाजित, अस्थिर और संघर्षपूर्ण भविष्य की ओर बढ़ेगी।
