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खाद्य सुरक्षा के महत्वपूर्ण उपायों को बनाए रखते हुए, गैर-मेन्युफेक्चरिंग खाद्य व्यवसायों के लिए रिकॉर्ड रखने और एफआईएफओ/एफईएफओ स्टॉक रोटेशन की आवश्यकताओं को तर्कसंगत बनाया गया

PIB Delhi

एक पारदर्शी, कुशल और व्यापार-अनुकूल नियामक तंत्र को बढ़ावा देने की सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य व्यवसायों का लाइसेंस और पंजीकरण) नियम, 2011 में संशोधनों की सूचना जारी की है।

खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य व्यवसायों का लाइसेंस और पंजीकरण) संशोधन नियम, 2026 के माध्यम से अधिसूचित इन संशोधनों का उद्देश्य खाद्य व्यवसायों के लिए अनुपालन  आवश्यकताओं को आसान बनाना है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना है कि जहाँ ज़रूरी हो, वहां आवश्यक खाद्य सुरक्षा और खाद्य पदार्थ के स्रोत का पता लगाने से जुड़े ज़रूरी उपाय लागू हों।

मौजूदा नियामक ढांचे के तहत, सभी लाइसेंस प्राप्त खाद्य व्यवसायों के लिए रिकॉर्ड बनाए रखना और ‘फर्स्ट इन फर्स्ट आउट’ (एफआईएफओ – जो पहले आए, वो पहले इस्तेमाल हो) या ‘फर्स्ट एक्सपायरी फर्स्ट आउट’ (एफईएफओ – जिसकी एक्सपायरी पहले हो, वो पहले इस्तेमाल हो) के सिद्धांतों के आधार पर स्टॉक रोटेशन प्रथाओं का पालन करना अनिवार्य था। इस संशोधन के बाद, ये आवश्यकताएं अब केवल खाद्य मैन्युफैक्चरिंग व्यवसायों पर ही लागू होंगी, जहाँ खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता आश्वासन और खाद्य पदार्थ के स्रोत का पता लगाना सुनिश्चित करने के लिए ऐसे नियंत्रण बेहद महत्वपूर्ण हैं।

खुदरा विक्रेताओं और दूसरी संस्थाओं सहित गैर-मैन्युफ़ैक्चरिंग खाद्य व्यवसायों को इन आवश्यकताओं से छूट दे दी गई है। इस कदम से खाद्य व्यवसाय चलाने वालों, खासकर छोटे और मंझोले उद्योगों पर अनुपालन का बोझ काफी कम होने की उम्मीद है, जबकि उन क्षेत्रों में मजबूत खाद्य सुरक्षा निगरानी बनी रहेगी जहाँ ऐसे नियंत्रण आवश्यक हैं।

यह संशोधन मंत्रालय के नियामक सुधारों के उस व्यापक एजेंडे का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य व्यापार करने में सुगमता में सुधार करना और खाद्य क्षेत्र में जोखिम-आधारित, परिणाम-उन्मुख नियमन को बढ़ावा देना है। पिछले कुछ वर्षों में, खाद्य व्यवसाय संचालकों के लिए अनुपालन को सरल बनाने के लिए कई उपाय शुरू किए गए हैं, जिनमें स्थायी लाइसेंस और पंजीकरण का प्रावधान, टर्नओवर सीमाओं में संशोधन, स्ट्रीट फूड वेंडरों के लिए दोहरे अनुपालन की आवश्यकताओं को हटाना और जोखिम-आधारित निरीक्षण प्रणाली लागू करना शामिल है।

इन सुधारों को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ खाद्य व्यवसाय तंत्र के सभी हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श के बाद अंतिम रूप दिया गया है। ये संशोधन नीति  आयोग द्वारा गठित ‘गैर-वित्तीय नियामक सुधारों पर उच्च स्तरीय समिति’ की सिफारिशों के भी अनुरूप हैं, जिसने प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने के साथ-साथ अनावश्यक नियामक बोझ को कम करने की ज़रूरत पर बल दिया था।

मंत्रालय विज्ञान-आधारित नियमों, हितधारकों के साथ विचार-विमर्श और नियमों को सरल बनाने के उपायों के ज़रिए भारत के खाद्य सुरक्षा ढांचे को मज़बूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।


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By udaen

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