न्यूज़ रिपोर्ट
विकास की रफ्तार में घटते जंगल: पांच वर्षों में 97 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि गैर-वानिकी परियोजनाओं को हस्तांतरित
नई दिल्ली। देश में बुनियादी ढांचा विकास की गति तेज होने के साथ ही जंगलों पर दबाव भी लगातार बढ़ रहा है। स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट इन फिगर्स 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच गैर-वानिकी परियोजनाओं के लिए 97,050 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी गई।
रिपोर्ट बताती है कि इस भूमि का लगभग 75 प्रतिशत (72,440.77 हेक्टेयर) हिस्सा केवल चार प्रमुख क्षेत्रों—सड़क निर्माण, खनन, सिंचाई परियोजनाओं और बिजली ट्रांसमिशन लाइनों—के लिए आवंटित किया गया। इससे स्पष्ट है कि देश में आधारभूत ढांचे के विस्तार की सबसे बड़ी कीमत जंगलों को चुकानी पड़ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार वन भूमि के डायवर्जन का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा राज्यों में केंद्रित है। इससे उन राज्यों में जैव विविधता, वन्यजीव आवास, जल स्रोतों और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास परियोजनाएं आवश्यक हैं, लेकिन वन भूमि के लगातार घटने से जलवायु परिवर्तन, कार्बन अवशोषण क्षमता में कमी, मिट्टी का क्षरण और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करने और वन क्षेत्र बढ़ाने के लक्ष्य तय किए हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर वन भूमि का डायवर्जन नीति-निर्माताओं के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है।
विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि परियोजनाओं की स्वीकृति प्रक्रिया में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को अधिक प्रभावी बनाया जाए, क्षतिपूरक वनीकरण की गुणवत्ता पर सख्ती से निगरानी रखी जाए तथा जहां संभव हो, विकास परियोजनाओं के वैकल्पिक मार्ग और तकनीक अपनाई जाए ताकि वन क्षति न्यूनतम हो।
विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों में भारत की सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत चुनौतियों में से एक माना जा रहा है।
स्रोत: State of India’s Environment in Figures 2026
