संपादकीय: जब सार्वजनिक संपत्ति का हिसाब धुंधला हो जाए
उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ों से लेकर देश के सीमांत गांवों तक, जब निजी कंपनियां नेटवर्क विस्तार की संभावनाएं तलाश रही थीं, तब BSNL ही वह संस्था थी जिसने कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में संचार का आधार तैयार किया। आज यदि उसी सार्वजनिक ढांचे के उपयोग को लेकर हजारों करोड़ रुपये के राजस्व पर सवाल उठते हैं, तो यह केवल एक कंपनी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि जनता के संसाधनों की सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।
CAG की रिपोर्ट ने दावा किया कि BSNL ने लगभग दस वर्षों तक रिलायंस जियो को अतिरिक्त तकनीकी उपयोग के लिए बिल नहीं भेजा, जिससे सरकारी खजाने को ₹1,757 करोड़ से अधिक का संभावित नुकसान हुआ। दूसरी ओर BSNL का कहना है कि नुकसान के आंकड़े का आकलन गलत तरीके से किया गया है। सत्य जो भी हो, एक तथ्य निर्विवाद है—इतनी बड़ी राशि को लेकर भ्रम की स्थिति स्वयं प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां आज भी अनेक गांव बेहतर मोबाइल और इंटरनेट कनेक्टिविटी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों की आय और संसाधनों का कुशल प्रबंधन हो, तो ऐसे क्षेत्रों में नेटवर्क विस्तार, डिजिटल शिक्षा, टेलीमेडिसिन और आपदा प्रबंधन की क्षमता को और मजबूत किया जा सकता है।
जनता यह जानना चाहती है कि यदि नुकसान हुआ तो जिम्मेदार कौन है? यदि नुकसान नहीं हुआ तो फिर CAG जैसी संवैधानिक संस्था को इतनी गंभीर टिप्पणी क्यों करनी पड़ी? क्या अनुबंधों की निगरानी पर्याप्त थी? क्या समय रहते आपत्तियों का समाधान किया गया?
उत्तराखंड के नागरिकों के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सार्वजनिक संस्थाओं की वित्तीय मजबूती का सीधा संबंध सेवाओं की गुणवत्ता से है। जब सरकारी संसाधनों के प्रबंधन पर सवाल उठते हैं, तब उसका असर अंततः आम नागरिक तक पहुंचता है।
लोकतंत्र में सार्वजनिक संपत्तियां किसी सरकार, कंपनी या अधिकारी की नहीं होतीं; वे जनता की होती हैं। इसलिए इस प्रकरण में पूर्ण पारदर्शिता, जवाबदेही और तथ्यों का सार्वजनिक खुलासा ही विश्वास बहाल करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
