भारतीय सांकेतिक भाषा व्याख्या सेवाओं के मानकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
नई दिल्ली स्थित Indian Sign Language Research and Training Centre (ISLRTC) ने 5 जून 2026 को भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) व्याख्या सेवाओं के लिए दिशा-निर्देश (Guidelines) तैयार करने हेतु गठित सलाहकार समिति की बैठक हाइब्रिड मोड में आयोजित की। बैठक में देशभर में सांकेतिक भाषा व्याख्या सेवाओं को अधिक प्रभावी, गुणवत्तापूर्ण और एकरूप बनाने से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक के दौरान भारतीय सांकेतिक भाषा दुभाषियों (Interpreters) के लिए आचार संहिता (Code of Ethics), पारिश्रमिक निर्धारण की व्यवस्था, सार्वजनिक कार्यक्रमों में दुभाषियों की मंच पर उचित स्थिति और दृश्यता के मानकों सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। समिति ने इस बात पर बल दिया कि सांकेतिक भाषा व्याख्या सेवाओं के लिए स्पष्ट और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य मानक तैयार किए जाएं, ताकि श्रवण बाधित व्यक्तियों को विभिन्न क्षेत्रों में समान और प्रभावी संचार सुविधा उपलब्ध हो सके।
यह पहल दिव्यांगजनों के अधिकारों और समावेशी विकास को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। प्रस्तावित दिशा-निर्देश शिक्षा, न्यायपालिका, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी कार्यक्रमों, मीडिया प्रसारण तथा सार्वजनिक आयोजनों में सांकेतिक भाषा व्याख्या की गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायक होंगे।
प्रमुख बिंदु
- भारतीय सांकेतिक भाषा व्याख्या सेवाओं के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं।
- दुभाषियों के लिए आचार संहिता और पेशेवर मानकों पर चर्चा हुई।
- पारिश्रमिक, मंच पर स्थिति और दृश्यता संबंधी मानकों को शामिल करने पर विचार।
- श्रवण बाधित समुदाय के लिए अधिक सुलभ और गुणवत्तापूर्ण सेवाएं सुनिश्चित करने का लक्ष्य।
- समावेशी भारत और सुगम्य भारत अभियान को मजबूती मिलने की उम्मीद।
संपादकीय दृष्टि
भारत में दिव्यांगजन अधिकारों की चर्चा अक्सर बुनियादी सुविधाओं और आरक्षण तक सीमित रह जाती है, जबकि संचार की सुगमता समान अवसरों की सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। भारतीय सांकेतिक भाषा व्याख्या सेवाओं के लिए राष्ट्रीय मानक विकसित करने की पहल इस दिशा में एक आवश्यक और स्वागतयोग्य कदम है।
हालांकि चुनौती केवल दिशा-निर्देश बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने की भी है। आज भी अधिकांश सरकारी कार्यक्रमों, न्यायालयों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रशिक्षित सांकेतिक भाषा दुभाषियों की भारी कमी है। यदि इस पहल के साथ दुभाषियों के प्रशिक्षण, प्रमाणन और रोजगार सृजन की ठोस व्यवस्था नहीं की गई, तो दिशा-निर्देश केवल दस्तावेज बनकर रह जाएंगे।
एक समावेशी लोकतंत्र की पहचान यह नहीं कि वह कितने कानून बनाता है, बल्कि यह है कि वह प्रत्येक नागरिक तक सूचना, संवाद और अवसर कितनी समानता से पहुंचाता है। भारतीय सांकेतिक भाषा व्याख्या सेवाओं का मानकीकरण उसी लक्ष्य की ओर बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है, जो श्रवण बाधित समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
