गिर के शेर और अदृश्य महामारी का खतरा
भारत अक्सर अपनी जैव विविधता पर गर्व करता है। गुजरात का गिर वन इस गर्व का सबसे चमकदार प्रतीक है, क्योंकि दुनिया के आख़िरी जंगली एशियाई शेर वहीं बचे हैं। लेकिन पिछले 10 दिनों में 5 शेरों की मौत और Babesia संक्रमण की आशंका ने यह साफ कर दिया है कि जंगलों के भीतर एक ऐसी अदृश्य लड़ाई चल रही है, जिसे हम केवल “वन्यजीव संरक्षण” का रोमांटिक विषय मानकर नजरअंदाज नहीं कर सकते।
यह सिर्फ पांच शेरों की मौत की खबर नहीं है। यह भारत की वन्यजीव नीति, जैविक सुरक्षा व्यवस्था और पर्यावरणीय प्रबंधन की परीक्षा है।
Babesia एक टिक-जनित परजीवी संक्रमण है, जो रक्त कोशिकाओं पर हमला करता है। सामान्य परिस्थितियों में यह नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन जब पूरी प्रजाति एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में केंद्रित हो, तब एक संक्रमण महामारी का रूप ले सकता है। गिर के साथ यही सबसे बड़ा खतरा है।
2018 में Canine Distemper Virus (CDV) और Babesia के संयुक्त संक्रमण से 20 से अधिक शेर मारे गए थे। उस समय भी सवाल उठे थे कि क्या भारत ने एशियाई शेरों के लिए पर्याप्त “backup population” तैयार की है? क्या शेरों को दूसरे सुरक्षित आवासों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए? लेकिन वर्षों बाद भी वही संकट लौटता दिख रहा है।
असल समस्या सिर्फ बीमारी नहीं है। समस्या वह पारिस्थितिक दबाव है जो इंसानी विस्तार ने जंगलों पर डाला है।
गिर अब केवल जंगल नहीं रह गया। उसके आसपास पशुपालन, पर्यटन, सड़कें, रिसॉर्ट और मानव गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। घरेलू पशुओं से टिक और संक्रमण वन्यजीवों तक पहुंचना अब सामान्य जोखिम बन चुका है। जलवायु परिवर्तन के कारण भी परजीवी और रोग फैलाने वाले जीवों का व्यवहार बदल रहा है। यानी भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं।
लेकिन हमारी वन्यजीव नीति अभी भी “मौत के बाद प्रतिक्रिया” मॉडल पर काम करती है।
बीमारी फैलने के बाद निगरानी शुरू होती है।
मौतें होने के बाद चिकित्सा टीमें सक्रिय होती हैं।
और हर संकट के बाद वही बयान आता है— “स्थिति नियंत्रण में है।”
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ने वन्यजीवों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी कोई गंभीर व्यवस्था बनाई है?
मानव स्वास्थ्य के लिए अस्पताल, सर्विलांस सिस्टम और महामारी प्रोटोकॉल हैं। लेकिन वन्यजीवों के लिए हमारी तैयारी बेहद सीमित है।
एशियाई शेर केवल एक प्रजाति नहीं हैं। वे भारत की पर्यावरणीय विरासत, पर्यटन अर्थव्यवस्था और जैविक अस्मिता का हिस्सा हैं। यदि पूरी आबादी एक ही क्षेत्र में रहेगी, तो कोई भी वायरस, परजीवी या प्राकृतिक आपदा पूरी प्रजाति को संकट में डाल सकती है।
इसलिए अब “Project Lion” को केवल संख्या बढ़ाने की परियोजना नहीं, बल्कि जैविक सुरक्षा मिशन में बदलना होगा।
इसके लिए जरूरी है:
- शेरों के लिए वैकल्पिक आवास विकसित किए जाएं
- वन्यजीव रोग निगरानी को वैज्ञानिक बनाया जाए
- मानव-वन्यजीव संपर्क क्षेत्रों पर नियंत्रण हो
- और पर्यावरणीय निर्णयों में केवल पर्यटन नहीं, पारिस्थितिकी को प्राथमिकता दी जाए
गिर के शेर आज केवल बीमारी से नहीं लड़ रहे।
वे उस विकास मॉडल से लड़ रहे हैं जिसमें जंगल बचाने की बातें बहुत हैं, लेकिन जंगलों को सुरक्षित रखने की तैयारी बेहद कम है।
