संपादकीय: मजदूर दिवस—अधिकारों की राजनीति और ज़मीनी सच्चाई के बीच
1 मई को मनाया जाने वाला मजदूर दिवस एक प्रतीकात्मक तिथि भर नहीं है; यह राज्य, बाजार और समाज के बीच श्रम के स्थान पर पुनर्विचार का अवसर है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें में हैं, जहाँ 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग ने आधुनिक श्रम-अधिकार विमर्श की नींव रखी। परंतु प्रश्न यह है कि एक सदी से अधिक समय बाद, क्या हमने उस संघर्ष की मूल भावना को नीतियों और क्रियान्वयन में रूपांतरित किया है?
भारत में श्रम के लिए एक विस्तृत कानूनी ढांचा मौजूद है—, और हालिया श्रम संहिताएँ। कागज़ पर यह व्यवस्था संतुलित दिखती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका प्रभाव असमान है। असंगठित क्षेत्र, जो कार्यबल का विशाल हिस्सा है, अब भी न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्य-परिस्थितियों से वंचित है। श्रम कानूनों का संहिताकरण (codification) हुआ, परंतु प्रवर्तन (enforcement) कमजोर बना रहा—यहीं नीति और वास्तविकता का अंतर स्पष्ट होता है।
महामारी के दौरान ने इस असमानता को उजागर कर दिया। प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन केवल एक मानवीय संकट नहीं था, बल्कि यह नीति-निर्माण की उस विफलता का संकेत था, जिसमें श्रमिकों को आर्थिक इकाई के रूप में तो देखा गया, पर नागरिक अधिकारों के साथ नहीं जोड़ा गया।
इसी बीच, नई अर्थव्यवस्था—विशेषकर प्लेटफॉर्म और गिग मॉडल—ने श्रम संबंधों की परिभाषा बदल दी है। , और जैसे प्लेटफॉर्म ‘लचीलापन’ (flexibility) का वादा करते हैं, लेकिन यह लचीलापन अक्सर श्रमिकों के अधिकारों की कीमत पर आता है। उन्हें ‘कर्मचारी’ के बजाय ‘पार्टनर’ कहा जाता है—एक ऐसा वर्गीकरण जो सामाजिक सुरक्षा, बीमा और न्यूनतम वेतन जैसे अधिकारों से उन्हें बाहर कर देता है। यह नियामक शून्य (regulatory vacuum) राज्य की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस परिदृश्य में मजदूर दिवस का अर्थ बदल जाता है। यह केवल अतीत के संघर्ष का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान नीतिगत प्राथमिकताओं की समीक्षा का दिन है।
- क्या श्रम संहिताएँ वास्तविक सुरक्षा दे पा रही हैं?
- क्या असंगठित और गिग श्रमिकों के लिए एक समान सुरक्षा ढांचा संभव है?
- क्या ट्रेड यूनियनों की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है?
इन प्रश्नों के उत्तर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और नैतिक भी हैं। श्रम का प्रश्न अंततः गरिमा (dignity), समानता (equality) और सामाजिक न्याय (social justice) से जुड़ा है।
अंततः, यदि विकास का मॉडल श्रमिकों को केवल ‘लागत’ (cost) के रूप में देखता है, तो वह दीर्घकालिक रूप से अस्थिर होगा। मजदूर दिवस हमें यह याद दिलाता है कि टिकाऊ विकास के लिए श्रमिकों के अधिकारों का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।
