दिव्यांग पेंशन, पूर्व सैनिक और आयकर: सम्मान बनाम राजकोष का द्वंद्व
देश में दिव्यांग पेंशन को लेकर हाल के दिनों में उभरी बहस केवल एक वित्तीय या प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राज्य की नैतिक प्रतिबद्धता और सामाजिक न्याय की कसौटी भी है। विशेष रूप से पूर्व सैनिकों (Ex-servicemen) के संदर्भ में यह प्रश्न और अधिक संवेदनशील हो जाता है, जहाँ “कटौती” की धारणा ने व्यापक असंतोष को जन्म दिया है।
तथ्यात्मक रूप से देखा जाए तो केंद्र सरकार द्वारा ऐसा कोई स्पष्ट विधेयक पारित नहीं किया गया है, जो सीधे तौर पर दिव्यांग पेंशन में कटौती करता हो। फिर भी, जमीनी स्तर पर पेंशनभोगियों के बीच “कम होती आय” की अनुभूति वास्तविक है। इसका मुख्य कारण हालिया आयकर व्याख्याएँ और प्रशासनिक बदलाव हैं, जिनके चलते कुछ श्रेणियों में दिव्यांग पेंशन अब आंशिक रूप से कर योग्य (taxable) मानी जा रही है।
यहाँ मूल प्रश्न पेंशन की राशि का नहीं, बल्कि “नेट आय” का है। जब किसी पूर्व सैनिक की पेंशन पर कर लगाया जाता है, तो कागजों पर राशि यथावत रहते हुए भी वास्तविक आय घट जाती है। यही स्थिति “अप्रत्यक्ष कटौती” की भावना को जन्म देती है। विशेष रूप से उन सैनिकों के लिए, जो सेवा के दौरान शारीरिक या मानसिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं, यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सम्मान का प्रश्न बन जाता है।
इस संदर्भ में के हालिया रुख को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसमें दिव्यांग पेंशन को “वेस्टेड राइट” यानी विधिक अधिकार माना गया है, न कि किसी प्रकार की दया या अनुदान। यह दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि राज्य की जिम्मेदारी केवल भुगतान तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने तक विस्तारित है।
वहीं दूसरी ओर, की मौजूदा व्याख्याएँ इस बहस को जटिल बनाती हैं। कानून के तहत कुछ पेंशन पूरी तरह कर-मुक्त हैं, लेकिन “service attributable disability” और “superannuation-based disability” के बीच अंतर ने अस्पष्टता पैदा कर दी है। यही अस्पष्टता नीतिगत असमानता और असंतोष को जन्म देती है।
उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहाँ बड़ी संख्या में परिवार सैन्य सेवा से जुड़े हैं, इस मुद्दे का प्रभाव और गहरा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कर संबंधी जागरूकता की कमी, दस्तावेजी प्रक्रियाओं की जटिलता और बैंकिंग अवसंरचना की सीमाएँ इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं। परिणामस्वरूप, नीतिगत बदलाव का असर सीधे सामाजिक असुरक्षा के रूप में सामने आता है।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य अपने उन नागरिकों के साथ, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपने शरीर और जीवन को दांव पर लगाया, महज राजकोषीय संतुलन के दृष्टिकोण से व्यवहार कर सकता है? दिव्यांग सैनिकों की पेंशन को सामान्य पेंशनधारकों की श्रेणी में रखना न केवल नीतिगत भूल है, बल्कि यह संवेदनशीलता की कमी भी दर्शाता है।
समाधान स्पष्ट है, यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। दिव्यांग पेंशन को पूर्णतः कर-मुक्त घोषित किया जाना चाहिए, साथ ही पात्रता निर्धारण की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, सैनिक बहुल राज्यों में विशेष सहायता केंद्र स्थापित कर कानूनी और कर संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
अंततः, यह बहस केवल “पेंशन” की नहीं, बल्कि उस सामाजिक अनुबंध की है, जिसके तहत राष्ट्र अपने रक्षकों को सम्मान और सुरक्षा का आश्वासन देता है। यदि इस अनुबंध में कहीं भी दरार आती है, तो उसका प्रभाव केवल पूर्व सैनिकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह समाज के नैतिक ढांचे को भी कमजोर करता है।
