| प्रेस क्लब का आरोप: सोशल मीडिया टेकडाउन से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा
ने केंद्र सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आलोचनात्मक कंटेंट हटाने के हालिया आदेशों को लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज की है। 1 अप्रैल 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में इसे “मनमाना” और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन” बताया गया।
प्रमुख आरोप
प्रेस क्लब के अनुसार:
- सरकार द्वारा जारी टेकडाउन आदेशों में पारदर्शिता की कमी है।
- आलोचनात्मक आवाज़ों—पत्रकारों, फैक्ट-चेकर्स और मीडिया संस्थानों—को निशाना बनाया जा रहा है।
- यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है।
कानूनी संदर्भ
प्रेस क्लब ने फैसले का हवाला दिया, जिसमें ने आईटी एक्ट की धारा 66A को निरस्त करते हुए “अस्पष्ट और मनमानी सेंसरशिप” के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाया था।
वर्तमान मामलों में, टेकडाउन आदेश कथित तौर पर के तहत जारी किए गए हैं, लेकिन प्रेस क्लब का कहना है कि इन आदेशों में कारणों का अभाव “चिलिंग इफेक्ट” पैदा करता है।
किन मामलों का जिक्र
विज्ञप्ति में कई हालिया घटनाओं का उल्लेख किया गया:
- फैक्ट-चेकर के पोस्ट ब्लॉक किए जाने का दावा
- मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे Molitics और National Dastak पर कार्रवाई
- यूट्यूब चैनल “4PM News” का ब्लॉक होना
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (Facebook, X) पर अकाउंट/पेज हटाए जाने की घटनाएं
सरकारी प्रक्रिया पर सवाल
प्रेस क्लब ने कहा कि:
- टेकडाउन आदेशों में स्पष्ट कारण नहीं बताए जाते
- प्रभावित पक्ष को सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता
- इससे डिजिटल स्पेस में “अदृश्य सेंसरशिप” का माहौल बनता है
मांग और निष्कर्ष
प्रेस क्लब ने सरकार से मांग की है कि:
- टेकडाउन प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए
- पत्रकारों और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जाए
- मनमानी कार्यवाही पर रोक लगे
- यह मुद्दा केवल कंटेंट हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राज्य की शक्तियों और नागरिक अधिकारों के संतुलन का व्यापक सवाल बनता जा रहा है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहां स्थानीय पत्रकारिता पहले से संसाधन और दबाव की चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे कदमों का प्रभाव और अधिक गहरा हो सकता है।
