संपादकीय: एक मार्ग के लिए रफ्तार, दूसरे के लिए प्रतिबंध—नीति का यह विरोधाभास क्यों?
देहरादून–दिल्ली के बीच प्रस्तावित एलिवेटेड मार्ग को तेज़ कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास के नाम पर प्राथमिकता दी जा रही है। वहीं दूसरी ओर, लालढांग–चिल्लरखाल मार्ग वर्षों से पर्यावरणीय आपत्तियों और कानूनी अड़चनों में उलझा हुआ है। यह विरोधाभास केवल दो परियोजनाओं का अंतर नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की असंगतियों और चयनात्मक दृष्टिकोण को उजागर करता है।
पहली नज़र में तर्क दिया जाता है कि लालढांग–चिल्लरखाल मार्ग राजाजी टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव ज़ोन से होकर गुजरता है, जहां वन्यजीव संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है। हाथी कॉरिडोर, जैव विविधता और संरक्षित वन क्षेत्र यहां विकास की सीमाएं तय करते हैं। यही कारण है कि इस मार्ग को लेकर न्यायालयों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने सख्त रुख अपनाया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या देहरादून–दिल्ली एलिवेटेड मार्ग पूरी तरह पर्यावरणीय जोखिमों से मुक्त है? क्या वहां पेड़ों की कटाई, भूमि उपयोग परिवर्तन और शहरी पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभाव नगण्य हैं? यदि नहीं, तो फिर एक परियोजना को “राष्ट्रीय आवश्यकता” बताकर आगे बढ़ाना और दूसरी को “पर्यावरणीय खतरा” कहकर रोक देना—यह दोहरा मापदंड क्यों?
असल मुद्दा “कहां सड़क बने” से ज्यादा “कैसे और किन शर्तों पर सड़क बने” का है। यदि एलिवेटेड मार्ग के लिए वैकल्पिक डिजाइन, तकनीकी समाधान और मुआवजा वनरोपण (compensatory afforestation) के आधार पर मंजूरी दी जा सकती है, तो लालढांग–चिल्लरखाल मार्ग के लिए भी ऐसे ही नवाचार और शमन उपायों (mitigation measures) पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया गया?
नीति-निर्माण में यह असंतुलन यह संकेत देता है कि पर्यावरणीय कानूनों का उपयोग कभी-कभी सख्ती से और कभी लचीलेपन के साथ किया जाता है—परिस्थिति के बजाय प्राथमिकताओं के आधार पर। यह न केवल स्थानीय समुदायों में असंतोष पैदा करता है, बल्कि कानून की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि लालढांग–चिल्लरखाल मार्ग स्थानीय लोगों के लिए केवल एक सड़क नहीं, बल्कि जीवनरेखा है—स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और बाजार तक पहुंच का साधन। इसके विपरीत, देहरादून–दिल्ली एलिवेटेड मार्ग मुख्यतः समय बचाने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने का माध्यम है। ऐसे में “आवश्यकता” की परिभाषा पर भी पुनर्विचार जरूरी है।
समाधान टकराव में नहीं, संतुलन में है। यदि सरकार वास्तव में विकास और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहती है, तो दोनों परियोजनाओं के लिए समान मानदंड, पारदर्शी प्रक्रियाएं और वैज्ञानिक मूल्यांकन सुनिश्चित करना होगा।
अन्यथा यह सवाल बार-बार उठेगा—
“जब एक मार्ग के लिए नियम लचीले हो सकते हैं, तो दूसरे के लिए इतने कठोर क्यों?”
और यही सवाल अंततः नीति की निष्पक्षता और शासन की विश्वसनीयता का परीक्षण बन जाएगा।
