संपादकीय:
Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards
https://youtu.be/E85l5zK0378
के 20वें स्थापना दिवस पर द्वारा दिया गया “आपका छह, मेरा नौ” वाला उदाहरण महज़ एक भाषण का हिस्सा नहीं, बल्कि आज के सूचना युग का सटीक विश्लेषण है। यह कथन उस खतरनाक प्रवृत्ति को उजागर करता है, जहां सत्य अब निर्विवाद नहीं रहा, बल्कि व्यक्तिगत धारणा और सुविधा के अनुसार ढलने लगा है।
डिजिटल क्रांति ने सूचना को लोकतांत्रिक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही “सत्य का विखंडन” (fragmentation of truth) भी तेज़ हुआ है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, एल्गोरिद्म और ट्रेंड-आधारित सूचनाओं ने एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार कर दिया है, जहां हर व्यक्ति अपनी पसंद का “सत्य” चुन सकता है। परिणामस्वरूप, तथ्य और भ्रम के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है। लोकतंत्र का आधार एक साझा यथार्थ (shared reality) पर टिका होता है। जब समाज इस बुनियादी सहमति से ही दूर होने लगे कि क्या सही है और क्या गलत, तब संवाद की जगह टकराव ले लेता है।
यहीं पर पत्रकारिता की भूमिका निर्णायक हो जाती है। जैसे संस्थानों की परंपरा हमें याद दिलाती है कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्य की खोज और उसकी रक्षा करना है। “दोनों पक्ष दिखाने” की प्रवृत्ति तब खतरनाक हो जाती है, जब वह झूठ और सच को समान स्तर पर खड़ा कर देती है।
आज आवश्यकता है तथ्यों की कठोर जांच, डेटा-आधारित रिपोर्टिंग और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली पत्रकारिता की। पत्रकारों को न केवल सूचनाओं की सत्यता की पुष्टि करनी होगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि समाज को भ्रमित करने वाली ताकतों को बेनकाब किया जाए।
“आपका छह, मेरा नौ” की बहस में यदि सत्य की स्पष्ट पहचान नहीं की गई, तो यह केवल एक बौद्धिक असहमति नहीं रहेगी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सकती है। ऐसे समय में पत्रकारिता को निष्पक्षता के साथ-साथ साहस भी दिखाना होगा—सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कहने का साहस।
अंततः, यह संपादकीय एक चेतावनी भी है और एक आह्वान भी—कि सूचना के इस शोर में सत्य की आवाज़ को पहचानना और उसे सशक्त बनाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
