उत्तराखंड में बफर जोन (ESZ) पर राज्य सरकार की सीमित शक्तियां: एक विधिक विश्लेषण
1. कानूनी आधार
इको-सेंसिटिव जोन (Eco-Sensitive Zone – ESZ) की अवधारणा मुख्यतः
के तहत विकसित हुई है। ESZ की अधिसूचना जारी करने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) के पास होता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय का बाध्यकारी निर्देश
के तहत ने 2022 में निर्देश दिया कि:
- सभी राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के चारों ओर कम से कम 1 किमी का ESZ अनिवार्य होगा
- यह “default minimum” है; राज्य चाहें तो इससे अधिक क्षेत्र प्रस्तावित कर सकते हैं
- ESZ में निर्माण, खनन, औद्योगिक गतिविधियाँ आदि कड़े नियंत्रण में रहेंगी
हालांकि बाद में कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य-विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए आंशिक लचीलापन भी दिया।
3. उत्तराखंड उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण
में ने स्पष्ट किया:
- ESZ निर्धारण में पर्यावरणीय संतुलन सर्वोपरि होगा
- विकास या राजनीतिक दबाव के आधार पर सीमा निर्धारण नहीं किया जा सकता
- के प्रावधानों का सख्ती से पालन अनिवार्य है
4. राज्य सरकार की शक्तियाँ: क्या कर सकती है?
राज्य सरकार की भूमिका “निर्णायक” नहीं बल्कि “सिफारिशी” है:
- ESZ का प्रारंभिक प्रस्ताव तैयार करना
- स्थानीय सर्वे, वैज्ञानिक अध्ययन कराना
- State Wildlife Board के माध्यम से अनुमोदन
- केंद्र सरकार को अंतिम प्रस्ताव भेजना
5. राज्य सरकार की सीमाएँ
राज्य सरकार:
- ❌ किसी गांव को सीधे ESZ से बाहर घोषित नहीं कर सकती
- ❌ न्यायालय के आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकती
- ❌ वन्यजीव संरक्षण कानूनों के विरुद्ध निर्णय नहीं ले सकती
6. गांव को ESZ से बाहर रखने की प्रक्रिया
यदि कोई गांव प्रस्तावित ESZ में आता है, तो:
- वैज्ञानिक मूल्यांकन (ecological sensitivity, wildlife corridor, distance)
- जनसुनवाई (Public Consultation)
- राज्य वन्यजीव बोर्ड की अनुशंसा
- केंद्र सरकार को प्रस्ताव
- अंतिम निर्णय — केंद्र सरकार/न्यायिक समीक्षा के अधीन
7. न्यायालयों का व्यापक रुख
भारतीय न्यायपालिका का दृष्टिकोण लगातार यह रहा है:
- “Ecology over Economy”
- पर्यावरणीय नुकसान को अपरिवर्तनीय मानते हुए
- “Precautionary Principle” और “Sustainable Development” को लागू करना
उत्तराखंड जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील राज्य में ESZ केवल प्रशासनिक सीमा नहीं, बल्कि कानूनी और पारिस्थितिक सुरक्षा कवच है।
राज्य सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन अंतिम निर्णय केंद्र और न्यायपालिका के अधीन होने के कारण वह किसी गांव को बफर जोन से सीधे बाहर नहीं कर सकती।
