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‘अर्थ आवर’ के 20 वर्ष: प्रतीक से प्रतिबद्धता तक का सफर

दुनियाभर में पर्यावरण संरक्षण के सबसे बड़े जन-अभियानों में शामिल (WWF) का ‘अर्थ आवर’ इस वर्ष 20 साल पूरे कर रहा है। 28 मार्च को रात 8:30 बजे से 9:30 बजे तक आयोजित होने वाला यह अभियान केवल एक घंटे के लिए लाइट बंद करने की अपील नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है।

प्रतीकात्मक कदम, व्यापक संदेश

‘अर्थ आवर’ की शुरुआत 2007 में हुई थी, जब पहली बार ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में नागरिकों ने ऊर्जा बचत और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता के लिए एक घंटे के लिए लाइट बंद की। आज यह पहल 190 से अधिक देशों और क्षेत्रों तक फैल चुकी है, जहां करोड़ों लोग स्वेच्छा से गैर-जरूरी बिजली का उपयोग रोककर पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हैं।

भारत में बढ़ती भागीदारी

भारत में ‘अर्थ आवर’ का प्रभाव हर वर्ष व्यापक होता जा रहा है। देश के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल, सरकारी भवन, कॉर्पोरेट संस्थान और आम नागरिक इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, जयपुर जैसे शहरों के प्रतिष्ठित स्मारक भी इस दौरान अंधेरे में डूबकर एक सशक्त संदेश देते हैं—ऊर्जा संरक्षण ही भविष्य की सुरक्षा है।

केवल लाइट बंद करना नहीं, जीवनशैली में बदलाव

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘अर्थ आवर’ का वास्तविक उद्देश्य एक घंटे की प्रतीकात्मक कार्रवाई से आगे बढ़कर लोगों को अपनी जीवनशैली में स्थायी बदलाव लाने के लिए प्रेरित करना है।

  • ऊर्जा की बचत
  • जल संरक्षण
  • प्लास्टिक उपयोग में कमी
  • जैव विविधता का संरक्षण

ये सभी कदम दीर्घकालिक पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक हैं।

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्यों के लिए महत्व

हिमालयी राज्य होने के कारण उत्तराखंड जलवायु परिवर्तन के प्रभावों—जैसे ग्लेशियर पिघलना, अनियमित वर्षा और भूस्खलन—से अधिक प्रभावित है। ऐसे में ‘अर्थ आवर’ जैसे अभियान केवल जागरूकता तक सीमित न रहकर स्थानीय स्तर पर ठोस पर्यावरणीय नीतियों और जनभागीदारी को प्रोत्साहित करने का अवसर भी प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष

‘अर्थ आवर’ के 20 वर्ष यह दर्शाते हैं कि वैश्विक स्तर पर छोटे-छोटे प्रतीकात्मक कदम भी बड़े बदलाव की नींव बन सकते हैं। 28 मार्च को एक घंटे के लिए लाइट बंद करना एक शुरुआत है—जरूरत इस बात की है कि यह जागरूकता साल भर की जिम्मेदारी में बदले।


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By udaen

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