संपादकीय | वरिष्ठों का सम्मान: कानून से आगे समाज की जिम्मेदारी
भारत एक ऐसे सामाजिक ताने-बाने पर खड़ा है, जहां “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव” केवल शास्त्रीय वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य माने गए हैं। फिर भी विडंबना यह है कि आधुनिकता, शहरीकरण और बदलते पारिवारिक ढांचे के बीच वही वरिष्ठ नागरिक आज उपेक्षा, असुरक्षा और मानसिक एकाकीपन से जूझ रहे हैं।
देश में वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती आबादी—जो 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों का एक बड़ा वर्ग है—नीतिगत दृष्टि से विशेष संरक्षण की मांग करती है। इसी परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करता है, जो संतान या उत्तरदायियों को अपने माता-पिता की देखभाल के लिए बाध्य करता है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इस कानून का प्रभाव सीमित ही दिखाई देता है। कई मामलों में बुजुर्ग न्यायिक प्रक्रियाओं, सामाजिक दबाव और जानकारी के अभाव के कारण अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाते।
यही वह संदर्भ है जिसमें सरकार द्वारा शुरू की गई जैसी पहल अहम बन जाती है। यह हेल्पलाइन न केवल आपातकालीन सहायता प्रदान करती है, बल्कि कानूनी सलाह, परामर्श और पुनर्वास सेवाओं का भी माध्यम है। परंतु, सवाल यह है कि क्या केवल हेल्पलाइन नंबर जारी कर देने से समस्या का समाधान संभव है?
वास्तविक चुनौती सामाजिक चेतना और संवेदनशीलता की कमी है। बुजुर्गों के प्रति बढ़ती उपेक्षा केवल आर्थिक या पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और नैतिक विफलता का संकेत है। संयुक्त परिवारों के विघटन, प्रवासन और उपभोक्तावादी जीवनशैली ने पारिवारिक जिम्मेदारियों को हाशिए पर धकेल दिया है।
उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहां बड़े पैमाने पर युवा रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं, वहां “एजिंग इन प्लेस” की समस्या और गंभीर हो जाती है। गांवों में अकेले रह रहे बुजुर्गों के लिए न केवल स्वास्थ्य सेवाएं, बल्कि भावनात्मक सहारा भी सीमित है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन, पंचायतों और नागरिक समाज की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
नीतिगत स्तर पर आवश्यक है कि:
- वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो,
- ग्राम और वार्ड स्तर पर निगरानी तंत्र विकसित किया जाए,
- और जागरूकता अभियानों के माध्यम से बुजुर्गों के अधिकारों की जानकारी व्यापक रूप से पहुंचाई जाए।
अंततः, यह समझना होगा कि बुजुर्गों का सम्मान केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि सभ्यता का पैमाना है। यदि समाज अपने अतीत को सम्मान नहीं देगा, तो वह अपने भविष्य को भी सुरक्षित नहीं रख पाएगा।
एल्डर लाइन 14567 केवल एक नंबर नहीं, बल्कि उस संवेदनशील समाज की परीक्षा है, जिसे हम बनाने का दावा करते हैं।
