Spread the love

लाइसेंस सरेंडर के दौर में भारतीय न्यूज़ चैनलों का भविष्य**

भारतीय न्यूज़ चैनल आज इतिहास के सबसे गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। जिन चैनलों ने महज़ 25 वर्षों में अपार प्रभाव, दर्शक और विज्ञापन शक्ति हासिल की थी, वही चैनल अब अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर करने को मजबूर हो रहे हैं। यह महज़ व्यावसायिक संकट नहीं, बल्कि विश्वसनीयता के पतन का परिणाम है।

दर्शक कहां गए?

पिछले कुछ वर्षों में न्यूज़ चैनल्स से दर्शक लगातार दूर हुए हैं। एक बड़ा दर्शक वर्ग खुले तौर पर कह रहा है कि उसने वर्षों से न्यूज़ चैनल “आंख तक नहीं लगाए”।
इस विमुखता का सबसे बड़ा कारण है—

जनसरोकारों से दूरी

पूरे दिन चलने वाली सांप्रदायिक और प्रायोजित बहसें

चीख़-चिल्लाहट आधारित स्टूडियो शो

एकतरफा नैरेटिव

जब चैनल जनता की समस्याओं से कटे, तो जनता ने चैनल से रिश्ता तोड़ लिया।

विश्वसनीयता: जो एक बार टूटी, वापस नहीं आती

भारतीय न्यूज़ चैनल आज “एक्सपोज़” हो चुके हैं। यह प्रकृति का नियम है कि जो एक बार बेनकाब हो जाता है, वह दोबारा भरोसे का केंद्र नहीं बन पाता।
दिल्ली के एक बड़े हिंदी न्यूज़ चैनल का उदाहरण सामने है—
एक विशाल उद्योगपति द्वारा टेकओवर के कुछ ही महीनों बाद चैनल का बड़ा दर्शक वर्ग उससे दूर हो गया।

चैनल खरीदा जा सकता है, दर्शक नहीं।

लाइसेंस सरेंडर का डरावना सच

बीते तीन वर्षों में देश के करीब 50 टीवी चैनलों ने अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर कर दिए हैं।
प्राप्त जानकारियों के अनुसार जिन बड़े ब्रॉडकास्टर्स ने अपने कई चैनल बंद किए या लाइसेंस लौटाए, उनमें शामिल हैं—

JioStar

Zee Entertainment

Eenadu Television

TV Today Network

NDTV

ABP Network

Sony Pictures Networks India (Culver Max Entertainment) – 26 डाउनलिंकिंग अनुमतियां

ABP News HD को उच्च लागत के कारण बंद करना पड़ा, जबकि NDTV ने प्रस्तावित NDTV Gujarati चैनल का लाइसेंस वापस कर दिया।

सबसे ज्यादा असर प्रादेशिक न्यूज़ चैनलों पर पड़ा, जो कभी मीडिया विस्तार की रीढ़ माने जाते थे।

विज्ञापन बाजार का पतन

गिरते दर्शक सीधे गिरते विज्ञापन राजस्व में बदल गए।
एक बड़ी कंपनी के CEO के अनुसार—

“हमारा सालाना पब्लिसिटी बजट करीब 20 करोड़ था,
लेकिन घटती पर्चेजिंग पावर, निर्यात संकट और चीन से प्रतिस्पर्धा ने बजट काटने को मजबूर कर दिया।”

आज कंपनियां विज्ञापन अपनी शर्तों पर दे रही हैं।
रेट स्वीकार्य हो तो विज्ञापन, वरना चैनल के दफ्तर में बैठना ही विकल्प है।

DTH से भी दर्शकों का पलायन

DTH सेक्टर के आंकड़े भी खतरे की घंटी हैं—

FY 2019–20: 72 मिलियन ग्राहक

FY 2024: 62 मिलियन ग्राहक

यह गिरावट साफ दर्शाती है कि दर्शक अब टीवी छोड़कर डिजिटल की ओर बढ़ चुका है।

डिजिटल, OTT और यूट्यूब का उभार

आज दर्शकों को आकर्षित कर रहे हैं—

वरिष्ठ पत्रकारों के यूट्यूब चैनल

बिना सेंसर, संदर्भ आधारित कंटेंट

खुला कमेंट सेक्शन

त्वरित सहमति-असहमति

यहां न तो शाम 6 से 8 बजे तक बेमतलब बहसें हैं, न स्टूडियो में “मुर्गे-मुर्गियां लड़ाने” की परंपरा।

इंटरटेनमेंट के लिए OTT प्लेटफॉर्म हैं,
ब्रेकिंग के लिए डिजिटल मीडिया,
और भरोसे के लिए—व्यक्तिगत पत्रकार।

सरकारी विज्ञापन का नया मॉडल

महंगे टीवी विज्ञापनों की काट अब LED वैन मॉडल बन रहा है—

कम लागत

गांव-कस्बों तक सीधा संपर्क

GPS आधारित निगरानी

विज्ञापन अवधि की स्वतंत्रता

छोटे और पहाड़ी राज्यों में यह प्रयोग तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

1965 से 2025: एक पूरा मीडिया चक्र

1965 में दूरदर्शन पर पांच मिनट का समाचार बुलेटिन,
1992 में ज़ी न्यूज़,
1999 में आज तक का 24×7 अवतार,
2000 के बाद चैनलों की बाढ़—

और अब 2025 आते-आते सरेंडर युग।

एक पत्रकार मित्र की कही बात आज सच लगती है—
“एक दिन लाल किले के पीछे न्यूज़ चैनलों के कैमरे और आईडी किलो के भाव बिकेंगे।”

आज अधिकांश न्यूज़ चैनल सरकारी विज्ञापनों और सूचना विभागों के सहारे वेंटिलेटर पर हैं।
लेकिन सवाल यही है—

क्या बिना विश्वसनीयता मीडिया जिंदा रह सकता है?

क्या दर्शक को लगातार मूर्ख समझने की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती?

यदि भारतीय न्यूज़ चैनल्स ने आत्ममंथन नहीं किया,
तो यह संकट पतन नहीं, पूर्ण विराम में बदल सकता है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *