उत्तराखंड में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध अब महज़ अलग-अलग घटनाएँ नहीं रह गए हैं, बल्कि यह एक गहरे और खतरनाक सिस्टम फेलियर का संकेत बन चुके हैं। देहरादून, ऋषिकेश और विकासनगर जैसे शहरों से सामने आई ताज़ा वारदातें राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। कहीं भीड़भाड़ वाले इलाके में युवती की हत्या, तो कहीं घर में अकेली महिला को निशाना बनाया जाना—ये घटनाएँ बताती हैं कि अपराधियों के भीतर से कानून का भय लगभग खत्म हो चुका है।सबसे शर्मनाक और चिंताजनक स्थिति तब सामने आती है जब बच्चियाँ तक सुरक्षित नहीं हैं। यह केवल पुलिसिंग की कमजोरी नहीं, बल्कि समाज और शासन—दोनों की सामूहिक विफलता का आईना है। जब अपराध खुलेआम होते हैं और दोषियों को त्वरित व सख्त सज़ा का डर नहीं रहता, तब जनता का पुलिस व्यवस्था से भरोसा उठना स्वाभाविक है।लेकिन इस संकट में सबसे बड़ी चिंता राज्य सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता है। महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, योजनाओं की घोषणाएँ होती हैं, पर ज़मीनी हकीकत इन दावों का खंडन करती दिखती है। कुछ माह पहले आई रिपोर्ट में देहरादून को महिलाओं के लिए असुरक्षित शहरों में गिना गया था। यह चेतावनी थी—लेकिन नीतियों में सख्ती और अमल में गंभीरता का अभाव साफ नजर आया।राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में महिला सुरक्षा पीछे छूटती प्रतीत हो रही है। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का भी संकेत है। सवाल यह है कि जब तक हालात बदतर न हो जाएँ, तब तक क्या सरकार जागेगी? क्या हर घटना के बाद औपचारिक बयान और आश्वासन ही पर्याप्त हैं?अब समय आ गया है कि बयानबाज़ी से आगे बढ़कर जवाबदेही तय की जाए। सख्त कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, संवेदनशील और जवाबदेह पुलिसिंग, तेज़ जांच और त्वरित न्याय—ये केवल विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं। इसके साथ ही राजनीतिक नेतृत्व को स्पष्ट संदेश देना होगा कि महिला सुरक्षा किसी भी कीमत पर समझौते का विषय नहीं है।उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, लेकिन जब उसकी बेटियाँ असुरक्षित हों, तो यह पहचान खोखली लगने लगती है। समाज, प्रशासन और सरकार—तीनों को मिलकर यह साबित करना होगा कि महिला सुरक्षा केवल नारा नहीं, बल्कि वास्तविक प्राथमिकता है। बिना ठोस कदमों के हालात नहीं बदलेंगे, और चुप्पी हर अपराध की साझेदार बनती चली जाएगी।
