EU नेताओं के लिए राष्ट्रपति भवन में परोसा गया हिमालयी स्वादों का शाही भोज
नई दिल्ली, 27 जनवरी।
जब देश-दुनिया भारत-यूरोपीय संघ (EU) के प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के आर्थिक असर पर चर्चा कर रही थी, उसी दौरान राष्ट्रपति भवन में एक अलग ही किस्म का संवाद चल रहा था—खाने के ज़रिये संस्कृति का संवाद।

छोटी प्लेट्स में जखिया आलू हरी टमाटर चटनी के साथ: इसमें जखिया आलू हरी टमाटर चटनी के साथ था।झंगोरा की खीर मेह लून और व्हाइट चॉकलेट के साथ: यह असल में चॉकलेट शेल में बाजरे की खीर थी, जिसके ऊपर मेघालय का मेश बेरी नमक डाला गया था।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा EU नेताओं के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज में इस बार पारंपरिक शाही या अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों के बजाय भारतीय हिमालयी क्षेत्र से प्रेरित विशेष मेन्यू परोसा गया। यह मेन्यू कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ी खाद्य परंपराओं को समर्पित था।
मेन्यू कार्ड के अनुसार, हर व्यंजन पहाड़ों की जीवनशैली, धीमी पकाने की तकनीक (slow cooking) और स्थानीय उत्पादों के सम्मान को दर्शाता था।

🍽️ भोज की प्रमुख झलकियां
स्टार्टर में
- जखिया आलू — उत्तराखंड की पारंपरिक डिश, सरसों के तेल और जखिया बीज के तड़के के साथ
- हरे टमाटर की चटन
बीच के व्यंजन
- सुंदरकला थिचोनी — कुट्टू और सब्जियों से बनी पारंपरिक पहाड़ी तैयारी
- याक चीज़ कस्टर्ड, भांग मठरी के साथ
- बिच्छू बूटी (स्टिंगिंग नेटल) पत्ते, सरसों के स्वाद में
- कद्दू और सिंकी (फर्मेंटेड मूली)
- कश्मीरी कतलाम ब्रेड
मुख्य भोजन में
- गुच्छी (मोरेल) और सोलन मशरूम—खसखस और जले टमाटर की ग्रेवी में
- हिमाचली स्वर्णु चावल
- तीन पारंपरिक चटनियां—राई पत्ते की, कश्मीरी अखरोट की और पूर्वोत्तर की अखुनी से बनी
मिठाई में
- रागी और कश्मीरी सेब का केक, तिमरू और सी-बकथॉर्न क्रीम के साथ
- असम कॉफी बीन्स से बनी कॉफी कस्टर्ड
- अंत में हिमालयी शहद और जाम्भीरी नींबू के साथ ताज़ा पर्सिमन फल
👨🍳 युवा शेफ्स की रचना
इस विशेष मेन्यू को शेफ प्रतीक साधु और शेफ कमलेश नेगी तथा उनकी टीम ने तैयार किया। दोनों शेफ हिमाचल प्रदेश के कसौली स्थित हैं और भारतीय पारंपरिक भोजन को वैश्विक फाइन-डाइनिंग मंच पर उसकी आत्मा से समझौता किए बिना प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं।

यह राजकीय भोज केवल एक डिनर नहीं था, बल्कि हिमालयी संस्कृति, जैव विविधता और परंपरागत ज्ञान को विश्व मंच पर सम्मान देने का प्रतीक भी था।
