संपादकीय | गेंद का मेला : पौड़ी की लोकस्मृति, जो चुपचाप खोती जा रही है
उत्तराखंड की पहचान केवल चारधाम, पर्यटन या चुनावी नारों से नहीं बनती, बल्कि उन लोकपरंपराओं से बनती है जो सदियों तक आम जनजीवन को जोड़ती रहीं। गेंद का मेला ऐसी ही एक परंपरा है, जो आज इतिहास के पन्नों और बुज़ुर्गों की स्मृतियों में सिमटती जा रही है। विशेष रूप से पौड़ी गढ़वाल के , और से जुड़ा इसका इतिहास हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि विकास के नाम पर हमने क्या खो दिया।
गेंद का मेला केवल एक खेल नहीं था। यह ग्रामीण समाज की संसद था, जहाँ शक्ति प्रदर्शन से अधिक सामूहिकता, अनुशासन और मेल-मिलाप का महत्व था। दाड़ा मंडी जैसे ऐतिहासिक व्यापारिक केंद्रों में यह मेला बाजार, संवाद और लोक-निर्णय का माध्यम बनता था। मवाकोट जैसे गढ़ी क्षेत्रों में यह युवाओं के लिए साहस, रणनीति और नेतृत्व का अभ्यास था। वहीं थाल नदी के तट पर खेली जाने वाली गेंद, प्रकृति और समाज के गहरे रिश्ते का प्रतीक थी—मानो नदी स्वयं इस लोकसंस्कृति की साक्षी हो।
विडंबना यह है कि जिन परंपराओं ने समाज को बिना प्रशासन, बिना पुलिस और बिना कानून के जोड़े रखा, उन्हें आधुनिक व्यवस्था ने “अव्यवस्थित” और “अप्रासंगिक” मान लिया। औपनिवेशिक दौर में शुरू हुआ यह उपेक्षा का सिलसिला आज भी जारी है। परिणामस्वरूप गेंद का मेला आज कहीं स्मृति, कहीं किंवदंती, और कहीं सिर्फ नाम बनकर रह गया है।
आज जब पलायन, सामाजिक टूटन और पहचान का संकट पहाड़ को जकड़े हुए है, तब गेंद के मेले जैसी परंपराएँ पहले से अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। यह मेला सिखाता था कि प्रतिस्पर्धा भी सामूहिक हो सकती है, और शक्ति का अर्थ केवल हिंसा नहीं, बल्कि नियंत्रण और जिम्मेदारी भी है।
दुखद यह है कि न तो नीति-निर्माताओं की प्राथमिकताओं में यह लोकविरासत है, न ही शिक्षा और संस्कृति की योजनाओं में। यदि दाड़ा मंडी, मवाकोट और थाल नदी से जुड़ी गेंद के मेले की परंपरा को अब भी दर्ज, शोध और पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसे केवल एक अधूरी कहानी के रूप में जानेंगी।
आज आवश्यकता है कि
- गेंद के मेले को लोकइतिहास और सामाजिक धरोहर के रूप में मान्यता मिले,
- स्थानीय पाठ्यक्रमों में इसका उल्लेख हो,
- और इसे पर्यटन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में देखा जाए।
क्योंकि जब कोई समाज अपने लोकखेल, लोकमेले और लोकस्मृति खो देता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी आत्मा भी खोने लगता है।
गेंद का मेला उसी आत्मा की पुकार है—जो अभी भी पौड़ी की हवाओं, नदियों और यादों में गूंज रही है।
