संपादकीय | निःशुल्क जीवन की महँगाई
जिस दौर में हर चीज़ की कीमत तय की जा रही हो, वहाँ सबसे महँगी वस्तुएँ वही हैं जो निःशुल्क हैं। विडंबना यह है कि जिन चीज़ों पर कोई टैग नहीं लगा, वही जीवन की असली पूँजी हैं—नींद, शांति, आनंद, हवा, पानी और सबसे बढ़कर हमारी साँसें।
आज का समाज विकास को केवल आर्थिक पैमानों से माप रहा है। सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है, लेकिन नींद घट रही है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर शांति कम हुई है। मनोरंजन के साधन अनगिनत हैं, फिर भी आनंद दुर्लभ होता जा रहा है। हम उस सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ सब कुछ खरीदा जा सकता है—सिवाय सुकून के।
नींद अब थकान की नहीं, समय प्रबंधन की समस्या बन चुकी है। शांति विलासिता समझी जाने लगी है, और आनंद को उपभोग से जोड़ दिया गया है। हवा और पानी, जो कभी प्रकृति की सहज देन थे, अब बोतलों और मशीनों में कैद होते जा रहे हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हम साँस लेते हुए भी जीवन से कटते जा रहे हैं—जैसे ज़िंदा रहना ही पर्याप्त हो, जीना कोई अनावश्यक अतिरिक्त माँग।
यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, चेतना का भी है। जब मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को भूलकर कृत्रिम ज़रूरतों में उलझ जाता है, तब विकास आत्मघाती हो जाता है। नीतियाँ तब तक अधूरी हैं, जब तक वे नागरिक को स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, मानसिक शांति और सम्मानजनक जीवन नहीं देतीं।
शायद अब समय है कि हम प्रगति की परिभाषा पर पुनर्विचार करें। जो निःशुल्क है, उसे बचाना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है—क्योंकि अगर ये भी बिकने लगे, तो जीवन केवल लेन-देन बनकर रह जाएगा।
असल संपन्नता वही है, जिसमें साँसें सुरक्षित हों, नींद गहरी हो और मन शांत।
