Spread the love

धर्म : धारण करने की वस्तु, नशा करने का माध्यम नहीं

समाज में धर्म की भूमिका सदैव मार्गदर्शक की रही है। धर्म ने मनुष्य को अनुशासन, करुणा और सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाया है। परंतु आज चिंता इस बात की है कि धर्म को धारण करने के बजाय उसे नशे की तरह उपयोग किया जाने लगा है। यह परिवर्तन न केवल धर्म के मूल उद्देश्य से विचलन है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी घातक सिद्ध हो रहा है।

धर्म का वास्तविक अर्थ है—जो जीवन को संभाले, जो मनुष्य को मर्यादा में रखे। जब धर्म विवेक के साथ जुड़ा रहता है, तब वह व्यक्ति को विनम्र बनाता है, सहिष्णुता सिखाता है और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की नैतिक शक्ति देता है। किंतु जैसे ही धर्म विवेक से अलग होकर उन्माद का रूप ले लेता है, वह नशा बन जाता है—और नशा कभी भी सही दिशा नहीं देता।

धर्म के नशे में डूबा व्यक्ति ईश्वर की जगह स्वयं को उसका प्रतिनिधि मान बैठता है। उसे लगता है कि सत्य उसी के पास है और बाकी सब गलत हैं। यही भाव कट्टरता को जन्म देता है, जहाँ संवाद के स्थान पर टकराव और करुणा के स्थान पर घृणा पनपती है। इतिहास साक्षी है कि धर्म का यह उन्मादी रूप समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ता रहा है।

सच्चा धर्म प्रश्न करने से नहीं डरता। वह आत्मचिंतन को बढ़ावा देता है, न कि भीड़ मानसिकता को। धर्म का उद्देश्य दूसरों को दंडित करना नहीं, बल्कि स्वयं के आचरण को शुद्ध करना है। यदि धर्म हमें अहंकारी, असहिष्णु और हिंसक बना दे, तो यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए कि कहीं हम धर्म का पालन नहीं, उसका दुरुपयोग तो नहीं कर रहे।

आज आवश्यकता है कि धर्म को आस्था की शांति के साथ जिया जाए, सत्ता और वर्चस्व के औज़ार के रूप में नहीं। धर्म को धारण करने का अर्थ है—मानवता को सर्वोपरि रखना। क्योंकि अंततः वही धर्म सार्थक है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाए; शेष सब केवल नशा है, और नशा चाहे किसी भी रूप में हो, समाज के लिए घातक ही होता है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *