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संपादकीय

क्या 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियाँ अब पहाड़ नहीं रहेंगी?—अरावली और NCR के भविष्य पर खड़ा बड़ा सवाल

सरकार द्वारा “100 मीटर से कम ऊँचाई वाले भू–आकृति को पहाड़ की परिभाषा से बाहर करने” पर विचार की चर्चा ने देश की पर्वतमालाओं—विशेषकर अरावली—के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है। यह मात्र एक तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि भारत के भू–पर्यावरण और करोड़ों लोगों के जल–जीवन–जलवायु को प्रभावित करने वाला निर्णय साबित हो सकता है।


अरावली—हजारों साल पुराना प्रहरी, जिसकी नींव हिला दी जाएगी

अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है। दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान की जल–सुरक्षा, हवा, तापमान और जैव–विविधता की रक्षा करने वाला यह प्राकृतिक कवच अब सबसे बड़े खतरे में है।
क्योंकि अरावली के NCR क्षेत्र में मौजूद अधिकांश पहाड़ियाँ—मांगीर बानी से लेकर संजय वन और फरीदाबाद–गुड़गांव की रिज–लाइंस तक—60 से 120 मीटर की ऊँचाई के बीच हैं।

अगर 100 मीटर से नीचे की जमीन को “हिल” न माना जाए, तो इनका कानूनी सुरक्षा-दायरा तुरंत कम हो जाएगा।


विकास का तर्क—सरकार कहेगी तेज़ी, लेकिन सवाल कहीं गहरा है

बेशक सरकार या राज्य यह कह सकते हैं कि—

  • भूमि उपलब्धता बढ़ेगी
  • हाईवे, उद्योग और आवासीय प्रोजेक्टों को गति मिलेगी
  • पर्यावरणीय क्लीयरेंस कम होगी

पर क्या विकास की परिभाषा इतनी उथली हो सकती है कि हम पहाड़ को सिर्फ उसकी मीटरों में मापी गई ऊँचाई के आधार पर पहचानें?


अरावली और NCR के लिए इस नई परिभाषा के विनाशकारी खतरे

1. NCR की हवा में जहर और बेतहाशा धूल

अरावली दिल्ली–NCR के लिए प्राकृतिक “विंड बैरियर” है।
यह हवा को साफ रखने, धूल को रोकने और तापमान को नियंत्रित करने का काम करती है।
छोटी पहाड़ियों की कानूनी सुरक्षा टूटने से—

  • बड़े पैमाने पर खनन
  • रिज–कटिंग
  • फार्महाउस और कमर्शियल विस्तार
    तेज़ी से बढ़ेगा।
    परिणाम—
    धूल–प्रदूषण 2–3 गुना तक बढ़ सकता है।

2. पानी का संकट और जमीन की प्यास

अरावली की पहाड़ियाँ “वाटर–रीचार्जिंग हब” हैं।
यह बारिश को धरती में उतारती हैं और भू–जल का स्तर संभालती हैं।
यदि इन्हें पहाड़ी का दर्जा ही न मिले, तो—

  • Gurgaon–Faridabad में पानी 400–800 फीट और नीचे जा सकता है
  • दिल्ली के रिज–क्षेत्र सूखने लगेंगे

3. बाढ़ और भू–कटाव का खतरा

छोटे पहाड़ी उभार भी बारिश के पानी को नियंत्रित करते हैं।
यदि ये संरक्षित न रहें तो—

  • मानसूनी बाढ़
  • फ्लैश–फ्लड
  • भूस्खलन

जैसी समस्याएँ NCR के दरवाज़े पर खड़ी होंगी।


4. जैव–विविधता का अन्त

सांभर, नीलगाय, चिंकारा, लोमड़ी और पक्षियों के माइक्रो–हैबिटेट छोटी अरावली पहाड़ियों में ही हैं।
इनके मिटते ही पूरा इको–सिस्टम बिगड़ जाएगा।


क्या पहाड़ सिर्फ ऊँचाई है?

विकास की असली परीक्षा यह है कि वह प्रकृति के साथ चलते हुए आगे बढ़े, न कि उसे काटकर रास्ता बनाए।
100 मीटर की सीमा बनाकर पहाड़ को ‘पहाड़ नहीं’ कहना विज्ञान और विवेक दोनों का अपमान है।
पर्वत सिर्फ ऊँचाई नहीं हैं—
वे जल, हवा, मिट्टी, संस्कृति और सभ्यता के संरक्षक हैं।


निष्कर्ष: नीति सही हो सकती है, समय नहीं

भारत की अधिकांश पर्वतमालाएँ—अरावली, विंध्य, सतपुड़ा, पूर्वांचल—कई जगह 100 मीटर से कम के स्पर्स और रिज–फॉर्मेशन से बनी हैं।
नीति यदि बिना पर्यावरणीय समीक्षा के लागू हुई, तो अगले 10 वर्षों में देश के कई क्षेत्रों का जल–जलवायु संतुलन टूट सकता है।

सरकार को चाहिए कि किसी भी नई परिभाषा से पहले व्यापक पर्यावरण अध्ययन कराए।
क्योंकि निर्णय एक बार लागू हुआ, तो अरावली जैसी उम्रदराज पर्वतमालाएँ अपने अस्तित्व के आखिरी दिनों में पहुँच जाएँगी।

विकास जरूरी है, पर विकास का नाम लेकर प्रकृति की सुरक्षा को खत्म कर देना सिर्फ गलत नहीं—खतरनाक है।



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By udaen

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