🪔 दीपावली और पटाखों की परंपरा: रोशनी के उत्सव से धुएं के उत्सव तक
लेखक: Dinesh pal Singh Gusain
Udaen News Network संपादकीय डेस्क
🔸 रोशनी की जड़ें, अंधकार पर विजय की कथा
दीपावली का मूल अर्थ है — ‘दीपों की पंक्ति’।
यह त्योहार हजारों वर्षों से अंधकार पर प्रकाश, अधर्म पर धर्म और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक माना गया है।
वेदों में दीपदान का उल्लेख है, पुराणों में दीपोत्सव का वर्णन मिलता है,
और रामायण में जब श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे,
तब अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर उनका स्वागत किया।
परंतु उस समय बारूद, आतिशबाज़ी या पटाखे का कोई अस्तित्व नहीं था।
🔸 बारूद के साथ आई आतिशबाज़ी
पटाखों का इतिहास भारत में बहुत नया है।
बारूद का आविष्कार चीन में 9वीं सदी ईस्वी में हुआ,
और सिल्क रूट के ज़रिए यह तकनीक अरब और फिर भारत पहुँची।
मुगल काल में, विशेषकर अकबर और जहांगीर के समय में,
दरबारों में “आतिशबाज़” नामक विशेष कारीगर रखे गए जो
राजसी उत्सवों में आतिशबाज़ी दिखाते थे।
धीरे-धीरे यह कला आम लोगों तक पहुँची,
और 16वीं–17वीं सदी से दीपावली के साथ पटाखों की परंपरा जुड़ने लगी।
🔸 ब्रिटिश काल से आधुनिक भारत तक
ब्रिटिश शासन के दौरान आतिशबाज़ी उद्योग भारत में फैलने लगा।
तमिलनाडु के शिवकाशी शहर ने 20वीं सदी में
भारत का सबसे बड़ा पटाखा निर्माण केंद्र बनने का गौरव पाया।
आज देश के 90% पटाखे वहीं बनते हैं।
दीपावली धीरे-धीरे “रोशनी का त्योहार” से
“ध्वनि और धुएं का त्योहार” बनने लगी।
🔸 परंपरा बनाम प्रदूषण
आधुनिक दीपावली का रूप हमारी परंपराओं से बहुत दूर चला गया है।
जहां पहले दीपक से उजाला होता था,
अब पटाखों से धुआं, शोर और प्रदूषण बढ़ता है।
हर साल दीपावली के बाद हवा की गुणवत्ता (AQI) गंभीर स्तर तक पहुँच जाती है।
डॉक्टर और पर्यावरणविद् चेतावनी देते हैं कि
यह प्रवृत्ति स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिए हानिकारक है।
🔸 सांस्कृतिक जिम्मेदारी की ओर
दीपावली का अर्थ केवल जश्न नहीं, बल्कि आत्मप्रकाश है।
यदि हम सच में “प्रकाश पर्व” मनाना चाहते हैं,
तो हमें लौटना होगा उस परंपरा की ओर जहाँ
दीपक, मिठास, परिवार और सादगी — सब एक साथ थे।
पर्यावरण के प्रति संवेदनशील दीपावली मनाना ही
आज की सबसे बड़ी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
🌿 निष्कर्ष
दीपावली की शुरुआत दीपों से हुई थी,
पर समय के साथ धुएं में खो गई।
अब समय है फिर से प्रकाश की ओर लौटने का।
📜 संदर्भ:
पुराण, चीनी ऐतिहासिक ग्रंथ, मुगल दरबारी अभिलेख, भारतीय बारूद उद्योग इतिहास, CPCB रिपोर्ट्स
