“आप इंसान को समाज में रख सकते हैं, लेकिन समाज को इंसान में नहीं रख सकते”
लेख : दिनेश पाल सिंह गुसाईं
समाज, नदी की धारा की तरह है—हम उसमें तैरते हैं, उसकी लहरों के सहारे जीते हैं, पर यह ज़रूरी नहीं कि उसकी पवित्रता हमारी आत्मा में भी उतर जाए।
इंसान को आप किसी भी व्यवस्था, किसी भी भीड़, किसी भी संस्कृति के बीच रख सकते हैं, लेकिन उसके भीतर उस व्यवस्था का भाव, उस भीड़ की संवेदना और उस संस्कृति की आत्मा नहीं डाल सकते, जब तक वह स्वयं उसे ग्रहण न करे।
समाज बाहर है, लेकिन असली परीक्षा भीतर की है
दीवारें, कानून, नियम और संस्थाएं केवल बाहरी ढांचा हैं। वे इंसान को दिशा तो दे सकते हैं, पर गंतव्य तक नहीं पहुँचा सकते।
एक व्यक्ति गाँव के चौपाल पर बैठ सकता है, शहर की संसद में भाषण दे सकता है, लेकिन अगर उसके भीतर करुणा, न्याय और सत्य का प्रकाश नहीं है, तो वह समाज के भीतर रहकर भी समाज से बाहर है।
संस्कार थोपे नहीं जा सकते
संस्कार बीज की तरह हैं—वे बाहर से बोए जा सकते हैं, लेकिन अंकुर भीतर से ही फूटता है। मजबूरी में कोई नियम मान सकता है, पर आस्था और संवेदना तो उसकी आत्मा के दरवाज़े से ही भीतर आएगी।
आप किसी को मंदिर ले जा सकते हैं, पूजा करा सकते हैं, पर श्रद्धा नहीं जगा सकते। आप किसी को संविधान पढ़ा सकते हैं, पर न्यायप्रिय नहीं बना सकते।
भीतर का समाज ही असली समाज है
जब तक समाज के मूल्य—समानता, सहयोग, सत्य और करुणा—हमारी रगों में न बहें, तब तक हम केवल “भीड़ का हिस्सा” हैं, “समाज का सदस्य” नहीं।
समाज में रहना एक भौतिक स्थिति है, लेकिन समाज को अपने भीतर रखना एक आध्यात्मिक यात्रा है।
आज का आईना
आज हम एक-दूसरे से तकनीक के जरिए जुड़े हुए हैं, लेकिन दिल से अलग हो रहे हैं। हम भीड़ में हैं, पर अकेले हैं। हम समाज में हैं, पर समाज हमारे भीतर नहीं है।
हमने साथ रहने की कला तो सीख ली है, पर साथ निभाने की आत्मा खो दी है।
अंतिम बात
समाज को इंसान में डालने के लिए कानून से अधिक प्रेम चाहिए, डर से अधिक संवेदना चाहिए, और औपचारिकता से अधिक आत्मचिंतन।
समाज में रहना जीवन की स्थिति है, लेकिन समाज को भीतर रखना जीवन का उद्देश्य।
