राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर के लिए जानकारियां जुटाने के तरीके में केंद्र सरकार में कुछ बदलाव किए हैं। अब एनपीआर में बायोमैट्रिक जानकारियां नहीं मांगी जाएंगी और न ही किसी प्रकार का कोई दस्तावेज लिया जाएगा। इसे पूरी तरह से स्वघोषित रखा जाएगा। इसके लिए सरकार ने 3,941.35 करोड़ रुपये का बजट भी जारी किया है।
पहले नागरिकता कानून, फिर एनआरसी और अब एनपीआर। अमर उजाला आपको नागरिकता कानून और एनआरसी में फर्क बता चुका है। आइए आज आपको राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर और एनआरसी के बीच फर्क बताते हैं:
एनपीआर और एनआरसी में फर्क क्या है?
- एनआरसी (NRC) असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सूची है जिसे असम समझौते को लागू करने के लिये तैयार किया गया है।
- इसमें केवल उन भारतीयों के नाम को शामिल किया गया है जो 25 मार्च, 1971 के पहले से असम में रह रहे हैं।
- उसके बाद असम आने वालों को बांग्लादेश वापस भेजा जा सकता है।
- एनआरसी के विपरीत, एनपीआर (NPR) नागरिकता गणना अभियान नहीं है।
- इसमें छह महीने से अधिक समय तक भारत में रहने वाले किसी विदेशी को भी इस रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा।
- एनपीआर के तहत असम को छोड़कर देश के अन्य सभी क्षेत्रों के लोगों से संबंधित सूचनाओं का संग्रह किया जाएगा।
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर
एनपीआर की आवश्यकता क्या है?
एनपीआर कब और कहां लागू हाेगा?
क्या पूछा जाएगा? क्या-क्या दस्तावेज लगेंगे?
- नाम
- घर के मुखिया से संबंध
- माता-पिता का नाम
- वैवाहिक स्थिति
- जीवनसाथी का नाम
- लिंग
- जन्मतिथि
- जन्म स्थान
- राष्ट्रीयता
- पता
- पेशा
- शैक्षणिक याेग्यता
एनपीआर का विचार कहां से आया?
सरकार को नागरिकों की इतनी जानकारी क्यों चाहिए?
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में अंतिम निवास स्थान, पासपोर्ट नंबर, पैन, ड्राइविंग लाइसेंस नंबर, वोटर आईडी कार्ड और मोबाइल नंबर को भी अद्यतन आंकड़ों के रूप में शामिल किया जा सकता है। इन आंकड़ों को वर्ष 2010 के राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में शामिल नहीं किया गया था।
