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संपादकीय/udaen news network

2027 की विधानसभा चुनावी बिसात पर कोटद्वार में किसका प्रभाव चलेगा? भाजपा-कांग्रेस की सीधी लड़ाई के बीच यूकेडी, पूर्व सैनिक संगठन, बेरोजगार युवाओं की आवाज और बसपा के प्रत्याशी भी चुनावी गणित बदलने की क्षमता रखते हैं।

कोटद्वार की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव केवल दो प्रमुख दलों के बीच मुकाबला नहीं रह सकता। यहां राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई के साथ स्थानीय नेतृत्व, जनाधार, संगठनात्मक ताकत और जनता की नाराजगी की भी परीक्षा होगी। सवाल यह है कि कौन नेता अपनी राजनीतिक पहचान को वास्तविक जनसमर्थन में बदल पाएगा?

भाजपा की ऋतु खंडूड़ी भूषण और कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी इस मुकाबले के प्रमुख राजनीतिक चेहरे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में ऋतु खंडूड़ी ने 32,103 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की थी, जबकि सुरेंद्र सिंह नेगी को 28,416 मत मिले थे। जीत का अंतर 3,687 मतों का था। निर्दलीय प्रत्याशी धीरेंद्र सिंह चौहान को मिले 12,484 मतों ने भी पिछले चुनाव में तीसरे विकल्प की मौजूदगी दर्ज कराई थी।

लेकिन 2027 का चुनाव पुराने आंकड़ों की पुनरावृत्ति नहीं होगा। बदलते राजनीतिक समीकरणों में नए दावेदारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

नगर निगम की राजनीति का असर विधानसभा चुनाव पर?

कोटद्वार की स्थानीय राजनीति में कांग्रेस की महापौर प्रत्याशी रंजना रावत, वर्तमान भाजपा महापौर शैलेंद्र सिंह रावत और भूतपूर्व सैनिक संगठन की ओर से महापौर प्रत्याशी रहे महेंद्र सिंह रावत जैसे चेहरों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

नगर निगम चुनावों में उभरे स्थानीय नेतृत्व और उनके समर्थकों का प्रभाव विधानसभा चुनाव की राजनीतिक चर्चा में जगह बना सकता है। हालांकि, महापौर चुनाव का जनसमर्थन सीधे विधानसभा चुनाव के मतों में परिवर्तित हो जाएगा, ऐसा मानना उचित नहीं होगा।

नगर की समस्याओं, स्थानीय संपर्कों और नागरिकों की अपेक्षाओं पर इन नेताओं की भूमिका राजनीतिक बहस को प्रभावित कर सकती है।

यूकेडी की बढ़ती सक्रियता और नए राजनीतिक विकल्प

उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) भी राज्य की क्षेत्रीय अस्मिता, रोजगार और पहाड़ के सवालों को लेकर अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यदि वह कोटद्वार में अपने संगठन को मजबूत कर स्थानीय मुद्दों पर प्रभावी ढंग से सक्रिय होता है, तो उसकी भूमिका चुनावी मुकाबले में महत्वपूर्ण हो सकती है।

बेरोजगार संगठन से जुड़े राम कंडवाल की संभावित दावेदारी भी इसी संदर्भ में चर्चा का विषय है। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर उनकी सक्रियता चुनावी बहस को प्रभावित कर सकती है। लेकिन आंदोलनकारी पहचान को चुनावी समर्थन में बदलना एक अलग चुनौती है।

बसपा के अधिकृत प्रत्याशी की भूमिका भी चुनावी गणित में महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रत्याशी की सामाजिक पहुंच, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं के समर्थन के आधार पर उसका प्रदर्शन तय होगा। बहुकोणीय मुकाबले में किसी भी दल के मतों का बंटवारा परिणाम को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका आकलन वास्तविक आंकड़ों के बिना नहीं किया जा सकता।

भाजपा और कांग्रेस के सामने क्या चुनौती है?

भाजपा के सामने अपने मौजूदा राजनीतिक आधार को बनाए रखने और स्थानीय स्तर पर जनता की अपेक्षाओं का जवाब देने की चुनौती होगी। कांग्रेस के लिए पुराने जनाधार को मजबूत करना और विभिन्न वर्गों के मतदाताओं तक पहुंच बनाना महत्वपूर्ण होगा।

वहीं, यूकेडी, बसपा और नए दावेदारों के सामने अपनी राजनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने तथा मतदाताओं के सामने विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करने की चुनौती रहेगी।

इस चुनाव में केवल बड़े दलों के उम्मीदवार ही चर्चा के केंद्र में नहीं होंगे। स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय छोटे दल और स्वतंत्र दावेदार भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।

असली सवाल: जनता के मुद्दे या नेताओं का वर्चस्व?

कोटद्वार के मतदाताओं के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चुनावी राजनीति उनकी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान कितना करती है।

नजूल भूमि पर वर्षों से बसे परिवारों के अधिकार, बेरोजगार युवाओं का भविष्य, व्यापारियों की समस्याएं, सड़क और जलनिकासी जैसी नागरिक सुविधाएं तथा स्थानीय रोजगार के अवसर—इन मुद्दों पर सभी दावेदारों से स्पष्ट जवाब मांगा जाना चाहिए।

राजनीतिक वर्चस्व का दावा करने वाले नेताओं को यह बताना होगा कि उन्होंने जनता के लिए क्या किया और आगे उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं। केवल विरोध, आरोप-प्रत्यारोप और व्यक्तिगत प्रभाव के दावे मतदाताओं की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते।

निष्कर्ष: 2027 में किसका पलड़ा भारी होगा?

कोटद्वार में भाजपा और कांग्रेस के स्थापित चेहरों के साथ यूकेडी, बसपा, पूर्व सैनिक संगठन से जुड़े नेतृत्व और बेरोजगार युवाओं के मुद्दों को उठाने वाले संभावित दावेदारों की मौजूदगी चुनाव को बहुआयामी बना सकती है।

हालांकि, अभी किसी एक पक्ष को निर्णायक बढ़त हासिल होने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। उम्मीदवारों की अंतिम सूची, दलों की संगठनात्मक स्थिति, स्थानीय मुद्दों पर उनका रिकॉर्ड और मतदाताओं का वास्तविक रुझान सामने आने के बाद ही मुकाबले का अधिक विश्वसनीय आकलन किया जा सकेगा।

कोटद्वार में 2027 की असली लड़ाई केवल राजनीतिक वर्चस्व की नहीं, बल्कि जनता का विश्वास जीतने की होगी।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव किसी नेता की व्यक्तिगत ताकत नहीं, बल्कि जनता के प्रति उसकी जवाबदेही है। जो इस कसौटी पर खरा उतरेगा, वही मतदाताओं के सामने अपने दावे को मजबूती से रख सकेगा।

— संपादकीय |www.udaen.info /दिव्यांगवाणी


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