जल संरक्षण पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में भारतीय सुदूर संवेदी संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. भास्कर ने कहा कि जल संरक्षण और प्रबंधन को लेकर ठोस नीति बने।
जलवायु परिवर्तन से गोमुख हिमनद लगभग एक किलोमीटर पीछे खिसक गया है। साथ ही हिमालय के सारे हिमनदों में बर्फ की मात्र कम होती जा रही है। इसको ध्यान में रखते हुए हमें भविष्य के लिए जल संरक्षण और प्रबंधन की योजना बनानी होगी। यह बात ग्राफिक एरा डीम्ड विश्वविद्यालय में जल संरक्षण पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में भारतीय सुदूर संवेदी संस्थान (आइआइआरएस) के वैज्ञानिक डॉ. भास्कर ने कही।
राष्ट्रीय कार्यशाला में डॉ. भास्कर ने धरती के बड़े जलस्रोत हिमालय के हिमनदों के घटने की समस्या को मानचित्रों से समझाया। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. आरसी जोशी ने कहा कि धरती पर बढ़ रहे पानी की समस्या के कारण तीसरे विश्व युद्ध की भूमिका बन रही है। इसलिए हमें जल संरक्षण और उसके उचित प्रबंधन की ठोस रूपरेखा पर त्वरित गति से काम करना होगा।
वर्षा जल संचयन पर कार्य कर रहे आइआइटी रुड़की के प्रोफेसर डॉ. दीपक खरे ने घटते भूजल स्तर को रिचार्ज करने के लिए वॉटर हार्वेस्टिंग की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. खरे ने छात्र-छात्रओं को वर्षा जल संचयन की उपयोगिता और महत्व को विभिन्न मॉडलों को समझाया। जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. दीपक कुमार ने कहा कि लोग अब धरती में काफी गहराई से जल का दोहन कर रहे हैं। जमीन केनिचले स्तर पर स्थित जलाशयों में आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्व मौजूद हैं। इस भूमिगत जल के उपयोग से जन्मजात अपंगता और कैंसर जैसी बीमारियां फैल रही हैं।एनआइएच, रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. एलएन ठकराल ने भारत सरकार के जल शक्ति अभियान के विभिन्न पहलूओं पर विस्तार से चर्चा की। विभाग के सिविल इंजिनियरिंग विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में प्रो. वीसी एचएन नागराजा, डॉ. संजीव कुमार, नितिन मिश्र आदि उपस्थित रहे।
