महिला सशक्तीकरण के सरकारी दावों और सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों की आर्थिक पारदर्शिता के बीच अब जवाबदेही की कसौटी जरूरी है।
उत्तराखंड में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘लखपति दीदी’ योजना का प्रचार जोर-शोर से हो रहा है। सरकार का दावा है कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं की आमदनी बढ़ाई जा रही है, उन्हें रोजगार से जोड़ा जा रहा है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। यह पहल स्वागतयोग्य है। लेकिन सवाल यह है कि जब आम पहाड़ी महिला अपनी छोटी-सी आजीविका को स्थायी बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, तब सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में होने वाली करोड़ों रुपये की वृद्धि पर सवाल क्यों नहीं उठने चाहिए?
उत्तराखंड की दो प्रमुख महिला नेताओं—ऋतु खंडूड़ी भूषण और रेखा आर्य—के वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में घोषित संपत्ति के आंकड़े इस बहस को प्रासंगिक बनाते हैं। उपलब्ध चुनावी हलफनामों के अनुसार, ऋतु खंडूड़ी की घोषित संपत्ति लगभग 3.39 करोड़ रुपये से बढ़कर 7.26 करोड़ रुपये हुई। वहीं रेखा आर्य की घोषित संपत्ति लगभग 12.78 करोड़ रुपये से बढ़कर 25.20 करोड़ रुपये हो गई।
इन आंकड़ों को देखकर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल उठाना और भ्रष्टाचार का दोषी घोषित कर देना दो अलग बातें हैं। संपत्ति में वृद्धि अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। इसके पीछे आय, निवेश, विरासत, संपत्ति के मूल्यांकन और अन्य वैध कारण हो सकते हैं। लोकतंत्र में जरूरी यह है कि संपत्ति और आय के स्रोतों को लेकर पारदर्शिता बनी रहे तथा किसी ठोस शिकायत की स्थिति में निष्पक्ष जांच हो।
रेखा आर्य प्रकरण ने बढ़ाई जवाबदेही की जरूरत
कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के पति द्वारा उनकी कथित संपत्ति को लेकर लगाए गए आरोपों ने इस बहस को और चर्चा में ला दिया है। मंत्री ने आरोपों को निराधार बताते हुए जांच के लिए तैयार होने की बात कही है। ऐसे में उचित रास्ता राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष जांच है। आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला जांच और कानून के अनुसार होना चाहिए।
लेकिन इस प्रकरण से एक व्यापक सवाल भी जुड़ता है—क्या सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही केवल विपक्ष से सवाल पूछने तक सीमित रहनी चाहिए? क्या सत्ता में बैठे लोगों को भी अपनी घोषित संपत्ति, आय के स्रोतों और सार्वजनिक पद से जुड़े हितों के बारे में उतनी ही पारदर्शिता नहीं दिखानी चाहिए?
पहाड़ की महिला को नारा नहीं, कमाई का अवसर चाहिए
उत्तराखंड के गांवों में महिलाएं खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, स्वयं सहायता समूहों और छोटे घरेलू कारोबार के सहारे परिवार चलाती हैं। कई महिलाएं मंडुवा, झंगोरा, दालों, स्थानीय फलों, जड़ी-बूटियों और हस्तशिल्प के जरिए अपनी आय बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन उत्पादन के बाद बाजार, उचित मूल्य, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और नियमित बिक्री जैसी चुनौतियां उनके सामने बनी रहती हैं।
ऐसे में लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब महिलाओं को केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र या ऋण नहीं, बल्कि टिकाऊ कारोबार और नियमित आमदनी मिले। सरकार को यह भी बताना चाहिए कि कितनी महिलाएं निर्धारित आय तक पहुंचीं, कितनों की आय लगातार बनी हुई है और कितने स्वयं सहायता समूह वास्तव में सफल कारोबार चला रहे हैं।
करोड़पति बनने का सपना सबके लिए हो
महिला को करोड़पति बनने का सपना देखने से रोकना नहीं चाहिए। लेकिन यह सपना केवल भाषणों में नहीं, अवसरों की समानता में दिखाई देना चाहिए। गांव की महिला को भी बाजार, पूंजी, तकनीक और सरकारी योजनाओं तक वही प्रभावी पहुंच मिले, जो बड़े कारोबारियों को उपलब्ध होती है।
साथ ही, जनप्रतिनिधियों की संपत्ति को लेकर उठने वाले गंभीर सवालों का जवाब भी दस्तावेजों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। सार्वजनिक पद किसी व्यक्ति को दोषी मानने का आधार नहीं है, लेकिन उसे जवाबदेही से मुक्त भी नहीं करता।
लोकतंत्र में असली उपलब्धि यह नहीं कि कितनी बड़ी संपत्ति किसके नाम दर्ज है, बल्कि यह है कि कितने परिवार गरीबी से बाहर निकले, कितनी महिलाओं की आय स्थायी हुई और जनता का शासन पर कितना भरोसा बढ़ा।
उत्तराखंड को लखपति दीदियां भी चाहिए, सफल महिला उद्यमी भी और पारदर्शी जनप्रतिनिधि भी। सरकार यदि इन तीनों कसौटियों पर अपनी उपलब्धियां सार्वजनिक करे, तो महिला सशक्तीकरण का नारा आंकड़ों से आगे बढ़कर जमीन पर दिखाई देगा।
